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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

देख तमाशा होली का

डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"

मस्त फुहारें लेकर आया, मौसम हँसी-ठिठोली का। देख तमाशा होली का।। उड़ रहे पीले-हरे गुलाल, हुआ है धरती-अम्बर लाल, भरे गुझिया-मठरी के थाल, चमकते रंग-बिरंगे गाल, गोप-गोपियाँ खेल रहे हैं, खेला आँख-मिचौली का। देख तमाशा होली का।। मस्त फुहारें लेकर आया, मौसम हँसी-ठिठोली का। देख तमाशा होली का।। पिचकारी बच्चों के कर में, हुल्लड़ मचा हुआ घर-घर में, हुलियारे हैं गली-डगर में, प्यार बसा हर जिगर-नजर में, चारों ओर नजारा पसरा, फागुन की रंगोली का। देख तमाशा होली का।। मस्त फुहारें लेकर आया, मौसम हँसी-ठिठोली का। देख तमाशा होली का।। डाली-डाली है गदराई, बागों में छाई अमराई, गुलशन में कलियाँ मुस्काई, रंग-बिरंगी तितली आई, कानों को अच्छा लगता सुर, कोयलिया की बोली का। देख तमाशा होली का।। मस्त फुहारें लेकर आया, मौसम हँसी-ठिठोली का। देख तमाशा होली का।। गीत प्यार का आओ गाएँ, मीत हमारे सब बन जाएँ, बैर-भाव को दूर भगाएँ, मिल-जुलकर त्यौहार मनाएँ, साथ सुहाना मिले सभी को, होली में हमजोली का। देख तमाशा होली का।। मस्त फुहारें लेकर आया, मौसम हँसी-ठिठोली का। देख तमाशा होली का।।

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