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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

मैं क्यों कर रोऊँ

डॉ० अनिल चड्डा

तुम्हारे लिए कहो मैं क्यों कर रोऊँ, पाप तुम्हारे किस लिए धोऊँ। अर्थों की क्यों बात हो करते, अर्थ हमेशा बदलते रहते, तेरे लिए जो काम न आएँ, उन शब्दों को तुम कहाँ समझते, भार तुम्हारे मन का बोलो, व्यर्थ ही में मैं क्यों कर ढोऊँ। तुम्हारे लिए ...... अवसाद नहीं, दिल शाद नहीं है, फिर भी जीवन भार क्यों लगता, मन में बातें छुपी जो रहती, उन बातों को किससे कहता, फूलों की मैं आस में जग में, संग -संग काँटे क्यों कर बोऊँ। तुम्हारे लिए ..... चलता जाता, ठोकर भी लगती, चोट पुरानी भी है उभरती, जिन हाथों ने थे बाल सँवारे, अँगुली काँटों सी है लगती, सपने भी तो परेशान हैं करते, चैन की नींद मैं कैसे सोऊँ। तुम्हारे लिए ......

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