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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

मैं करूँ तो क्या करूँ

डॉ० अनिल चड्डा

तुम कहो तो शिकायत भी न करूँ, तुम्ही कहो, मैं करूँ तो क्या करूँ। अभिलाषाओं ने थी उड़ान भरी, पंख कटे, धरती पे गिरी, कुछ हाथ न आया चाह कर भी, तड़प-तड़प कर थी वो मरी, गर फिर भी अभिलाषा जन्मे, तो तुम्ही कहो, मैं क्या करूँ। तुम कहो….. वीरान हुए, आबाद शहर, क्यों टूटा दिल पर ऐसा कहर, नफरत की आँधी ऐसी चली, बर्बाद हुआ था दिल का नगर, दिल फिर भी गर बसना चाहे, तो तुम्ही कहो, मैं क्या करूँ, तुम कहो…. कोई बात अगर कहनी हो हमें, दिल चीर दिखाना पड़ता है, गर प्यार की दो बातें कह लें, उल्टा ही ताना पड़ता है, दिल फिर भी गर न माने, तो तुम्ही कहो, मैं क्या करूँ, तुम कहो .. ..

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