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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

होली के दोहे

सुबोध श्रीवास्तव

ढोल-नगाड़े बज रहे,.....उड़ता रंग-गुलाल। होली पर हर ओर है, खुशियों का संजाल॥ धरती से आकाश तक, छाया है उल्लास। त्यौहारों पर दिन खिले, जैसे हो मधुमास॥ लाल-गुलाबी-बैगनी, छाया है हर रंग । होली में हुडदंग के, अपने-अपने ढंग॥ थिरक रही हैं गोरियाँ, लाज-शर्म को छोड़। इधर रंग छाया हुआ, उधर भंग की होड़॥ होली खेलें गोपियाँ,.........कन्हैया के संग। खेल-खेल में रच रहा, अनुपम एक प्रसंग॥ होली में ऐसे चले, रंगों की बौछार। चुन-चुनकर फिर से जुड़ें, टूटे मन के तार॥ कोई रंगों को चुने,.........कोई छाने भंग॥ होली में हर एक का, अपना-अपना रंग॥ अबकी होली में उड़े,........ऐसे रंग-गुलाल। निर्मल हों मन, दूर हों, शिकवे और मलाल॥ पहर-पहर इठला रहे, छाई अजब उमंग। रंगीला मन हो गया, ...चढ़ा प्रेम का रंग।। मनभावन मौसम हुआ, बही नेह की धार। मन से मन मिलने लगे, ऐसी चली बयार॥ होली में सबको मिले, प्रभु की कृपा अपार। खुशियों वाले रंग की,...जमकर हो बौछार॥

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