मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

दोहे

शिवेन्द्र मिश्र 'शिव'

आधुनिकता में मस्त हैं, सब नर-नारी संत। अन्तर्मन पतझड़ हुआ, दिखला रहे बसंत। देखो कैसी हो गयी, लोकतंत्र की रीति। सिर्फ चुनावी रंग में, करते 'शिव' से प्रीति। आया मौसम फाग का, मन में उठी उमंग। भूल पुरानी रंजिशे, 'शिव' मिल खेले रंग।। फागुन आया झूमकर, जिसकी धूम अनंत। देखो 'शिव' भी मचलते,जिन्हें कहें सब संत। फागुन मे बस दीखता, होली का हुड़दंग। मर्यादा सब भूलकर, बाल-वृद्ध 'शिव' संग। देखो! बाबा को चढा़, यौवन का है जोश। दादी को दौडा़ रहे, हाथ रंग, खो होश ।। बहके बहके सब यहां, चढा़ फाग का रंग। बूढे़ बच्चे और युवा, सबका बदला ढंग ।। जब से भाभी ने रंगा, मुख 'शिव' लाल गुलाब। झूम उठा है मन मेरा, लगता जैसे यह ख्वाब।। देख सखी करने लगी, बहकी-बहकी बात। फागुन लाया है प्रिये,प्यार की 'शिव' सौगात।। इंद्र धनुष सा मन मेरा, आया जो त्यौहार। स्वंय प्रकृति ने है किया, मौसम का सिंगार।।

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें