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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

बूंद की विशालता में समंदर

कवि: रिषभ महेता
अनुवादक: डॉ.रजनीकान्त एस.शाह

मुझे तो बस जीना है अथवा यह कहूँ कि मुझे तो बूंद में उतरना है। वैसे देखा जाए तो बादल सदैव माथे पर बरसता है, वैसे देखा जाए तो जीव कुएँ के तट पर तरसता है, तोष की तजवीजें छोड मुझे तो तड़पना है। मुझे तो बस जीना है। अथवा यह कहूँ कि मुझे तो बूंद में उतरना है। कायम रहना एक ठौर किसलिए? एक ही एक गीत गाना किसलिए? अनजान स्वर के सप्तक में मुझे तो संचरित होना है। मुझे तो बस जीना है। अथवा यह कहूँ कि मुझे तो बूंद में उतरना है। जीना अर्थात् साँसों के साथ खेलना, खुद को सहना,अन्य को अच्छा लगना, मौत नामक एक मजेदार सपने को संचित करना है, मुझे तो बस जीना है। अथवा यह कहूँ कि मुझे बूंद में उतरना है। मुझे तो बस जीना है।


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