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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 57, मार्च(द्वितीय), 2019

प्रवासी हिन्दी कहानी कोश
(लेखिका डॉ. मधु संधु) की समीक्षा

डॉ. नीना मित्तल(समीक्षक)

साहित्य में प्रचलित विभिन्न विमर्शों स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, किन्नर विमर्श की भांति आज प्रवासी विमर्श भी चिंतन का प्रमुख आधार है। भारतीय मूल के लोग समस्त विश्व में फैले हुये हैं। उन्होने विदेशों को अपनी कर्मभूमि बनाया है। विदेश में रहने वाले हिन्दी साहित्यकारों के साहित्य से हिन्दी का अन्तर्राष्ट्रीय विकास हुआ है, क्योंकि उनकी रचनाओं में विभिन्न देशों की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, पृष्ठभूमि उनकी लेखनी की विषय- वस्तु बनी हैं। उन देशों के इतिहास और भूगोल का वर्णन, नवीन समस्याओं से जूझना, अत्याधुनिक समाधान, नवीन परिप्रेक्ष हिन्दी पाठक वर्ग के लिए एक नई दुनिया के द्वार का खुलना है। इससे विभिन्न स्थितियों और जीवन शैलियों के आदान-प्रदान का पाठकों तक विस्तार भी होता है। अत: डॉ. मधु संधु ने भारतीय और प्रवासी कहानी साहित्य को भलीभाँति खंगाल कर अत्यन्त गहन और मौलिक दृष्टि से इस महत्त्वपूर्ण मौलिक ग्रंथ- ‘प्रवासी हिन्दी कहानी कोश (महिला कहानीकारों के संदर्भ में)’ की रचना की है, क्योंकि महिला सशक्तिकरण की ठोस भूमि पर महानगरीय, शहराती, ग्रामीण, कामकाजी, दलित, उच्च शिक्षित, अर्ध शिक्षित स्त्री के अस्तित्व को अनेक परिप्रेक्ष्यों में प्रस्तुत करने वाली वह एक सशक्त साहित्यकार हैं। इस संबंध में वह अपने आलेख– ‘ हिन्दी का भारतीय एवं प्रवासी महिला कथा लेखन’ में लिखती हैं – “ प्रवासी साहित्य अमेरिका में ही नहीं, यूरोप, इंग्लैंड, डेन्मार्क यहाँ तक कि पूरे सऊदी अरब तक फैला है। कुछ देर भले ही प्रवासी कथाकार मुख्य धारा से कम होने की बात करते रहे हों, पर आज उनका साहित्य, उसका एक-एक शब्द कह रहा है कि वे हिन्दी साहित्य जगत का अभिन्न और अनिवार्य अंग हैं।“ (संचेतना, जनवरी 2014)

गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर एवं अध्यक्ष रह चुकी डॉ. मधु संधु आज 21 वीं शती की 111 हिन्दी लेखिकाओं के बीच सशक्त रूप में उभरी हैं। दो कहानी संग्रह, एक काव्य संग्रह, छह शोधपरक ग्रन्थों के साथ-साथ साहित्य कुंज, साहित्य सुधा, सेतु, विभोम स्वर, हंस, हरिगधा, संचेतना, हिन्दी अनुशीलन, गर्भनाल, कथादेश, गगनाञ्चल, कथाक्रम, अभिव्यक्ति, आधारशिला, मसि कागद, समीक्षा जैसी प्रसिद्ध, स्तरीय पत्रिकाओं में अढ़ाई- तीन सौ शोध पत्र, आलेख, कहानियाँ, यात्रा संस्मरण, लघु कथाओं, कविताओं के अनंत संसार की उनकी सामाग्री प्रकाशित हैं। कहानी कोश (1951-60), हिन्दी कहानी कोश (1991-2000), लेखक कोश (सह लेखिका) की शृंखला में ‘ प्रवासी हिन्दी कहानी कोश ’ चौथे कोश ग्रंथ के रूप में प्रकाशित हुआ है । लगभग पौने तीन सौ पृष्ठों में सिमटा यह ग्रंथ पच्चास कहानीकारों की कोई साढ़े चार सौ कहानियों की विरासत को समेटे है। जिनमें महिला लेखिकाओं के पात्रों के भीतरी विक्षोभ, टूटन, संघर्ष, नए सम्बन्धों के टूटते- जुडते दस्तावेज़ कहीं न कहीं उनके अपने व्यक्तित्व का दर्पण बने हैं।

आज वैश्वीकरण के परिवेश में कोश ग्रंथकार का यह श्रमसाध्य प्रयास है कि उसने कहानियों के पठन, मंथन से लेकर उनके संपर्क, संकलन संग्रह के हर सूत्र एवं रचना के संदर्भ में हर संभव जानकारी देने का प्रयास किया है। इस कोश में रचनाकार, रचनाकाल, कथासार, पात्र, कथ्य, यहाँ तक कि प्रकाशन का व्योरा भी प्रदान किया गया है।

अनेक महिला कहानीकार प्रवासी होते हुये भी अपनी मिट्टी से गहरा सरोकार रखे हैं। इसलिए उन्हें क्रमबद्ध ढंग से सँजोकर रखना समय की मांग है। डॉ. मधु संधु ने विशेषत: महिला कहानीकारों के संदर्भ में यह रचना की है, परंतु इसमें भी उनके समक्ष अनेक सीमा रेखाएँ रही हैं कि क्या प्रवासी कहानीकारों की भारत से जुड़ी कहानियों को छोड़ दिया जाये ? एक ही शीर्षक के अंतर्गत एकाधिक कहानियाँ या कई कहानियों के दो-दो नाम आदि अनेक चुनौतियों का समाधान करते हुये शोधार्थियों के लिए सुविधाजनक हल प्रधान किया है तथा कोशीय कलेवर में एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ प्रस्तुत करने का साहसिक कार्य किया है।

लेखिका ने प्रवासी महिला कहानीकारों की अंतर्जाल पर प्रकाशित कहानियों को भी अपनी परिधि में लेने का अथक परिश्रम किया है।

कोश के अंत में वर्णानुक्रमणिका के अनुसार परिशिष्ट दिया गया है। नमन प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित यह कोश ग्रंथ मार्गदर्शक के रूप में शोधार्थियों के लिए प्रकाश पुंज का कार्य करेगा।


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