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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 57, मार्च(द्वितीय), 2019

डर

प्रीती श्रीवास्तव

नाकामियों के डर से हम रास्ते बदलते रहे। लोग हमें रोज नये मिले और हमें छलते रहे।। भरोसे का न था कोई हमसफर हमारा यारों। हम हर शै पर अक्सर ही ऐतबार करते रहे।। मेरी तन्हा सी जिन्दगी का फायदा था जिन्हें। वो हमारी नाजो अंदाज पर आहें भरते रहे।। आंख तो बहती रही शामो सहर हमारी भी। हम फिर भी खताओं को उनकी माफ करते रहे।। दर्द है ये लाइलाज आज जाना हमने रहबर। तीर निकल गया हाथ से हम हाथ मलते रहे।। खाई है इक तरफ इक तरफ दरिया तूफानी। मौत की आरजू में मगर हम आगे बढ़ते रहे।।


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