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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 57, मार्च(द्वितीय), 2019

तुम्हारे बाद

डॉ.प्रणव भारती

दिल के दरवाज़े पे साँकल जो लगा रखी थी उसकी झिर्री से कभी ताक लिया करती थी वो जो परिंदों की गुटरगूँ सुनाई देती थी उसकी आवाज़ों से ही माप लिया करती थी न जाने गुम सी हो गईं हैं ये शामें क्यूँ और तन्हाई के भी पर से निकल आए हैं मेरे भीगे हुए लम्हों से झाँकते झौंके आज पेशानी पे ये क्यों उतरके आए हैं कुछ तो होता ही है ,भीतर बंधा सा होता है जो चीर देता है किन्ही अधखुले अल्फ़ाज़ों को क्या मैं कह दूँ वो कहानी सबसे ही या तो फिर गुम रहूँ और होंठ पे ऊँगली रख लूँ ??


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