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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 57, मार्च(द्वितीय), 2019

तुम बिन

डॉ ललिता यादव

तुम बिन जिन्दगी अधूरी सी लगती है तुम्हारा साथ न हो तो कुछ कमी सी लगती है मैं अकेले भी चल सकती हूँ जीवन के राहों पर पर न जाने क्यूँ जिन्दगी अजनबी सी लगती है तुम मुझे टूटकर भी बिखरने नहीं देते यह बात तुम्हारी मुझे सबसे अलग लगती है जब जब तुझको देखती हूँ मेरे साथ खड़े जिन्दगी मेरी बढ़ गई सी लगती है न जाने तुम्हें देखकर ऐसा क्यूं लगता है तुम्हें भी मुझसे मुहब्बत हो गई सी लगती है प्यार का जहाँ एक तरफा नहीं खिलता आग दोनों तरफ लगी सी लगती है जिन्दगी साथ में तेरे गुजर जाएंगे वक्त कभी छाँव तो कभी धूप सी लगती है


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