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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 57, मार्च(द्वितीय), 2019

जंग न हो

खुरशीद खैराड़ी

चाह हमारी एक यही है प्यार बढ़ाएं जंग न हो शर्त यही है दोस्त हमारा आतंकी के संग न हो हाथ बढ़ाकर घात हमेशा की है तूने पहले भी कोई समझौता हो संधि कोई हो हरगिज़ भंग न हो ट्यूलिप के फूलों से फिर से महके जन्नत की वादी केसर की क्यारी बर्फ़ीली घाटी ख़ूनी रंग न हो नफ़रत करने वाले दोनों मुल्कों में मिल जायेंगे यार मोहब्बत करने वाले इन लोगों से तंग न हो *तोपों गोलों और विमानों की आवाज़ें थमने दे* *मार्च महीना है बच्चों का ध्यान ज़रा भी भंग न हो* आ दोनों ही मिलकर जंग लड़ें इन दहशतगर्दों से ताज ख़लीफ़ा जैश-ओ-हिज़्बुल वालों का तू अंग न हो इक 'खुरशीद' उजाला फैलाता है दोनों मुल्कों में यार सियासत की कालिख़ से भोर हमारी दंग न हो


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