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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 57, मार्च(द्वितीय), 2019

अभिनन्दन है अभिनन्दन

खुरशीद खैराड़ी

मातृधरा की पावन मिट्टी पर अभिनंदन है अभिनंदन अपनी जननी अपनी धरती पर अभिनंदन है अभिनंदन गौरी-गजनी के चेलों को आँख दिखाकर तुम लौटे हो राणा और शिवा की थाती पर अभिनदंन है अभिनंदन मिग से तुमने धूल चटाई मार गिराया जेट-लड़ाकू दिव्य पराक्रम अद्भुत करनी पर अभिनदंन है अभिनंदन सौ-सौ ग़ज़लें तुम पर वारूँ फूल नहीं लो गीत उछालूँ मेरे शाइर दिल की बस्ती पर अभिनदंन है अभिनंदन कब तक रखते शेर को गीदड़ फंदा आख़िर टूट गया लो फिर से दहाड़ो झपटो बैरी पर अभिनंदन है अभिनंदन सीना चौड़ा रखकर लौटे शीश न झुकने पाया 'दादा' दाग़ न लगने पाया वर्दी पर, अभिनदंन है अभिनंदन । थाती--अमानत, धरोहर । 'दादा'--राजस्थान में राजपूतों में बड़े भाई के लिए संबोधन (सैनिक ,नागरिकों (civilians)के बड़े भाई की तरह होते हैं )


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