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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 57, मार्च(द्वितीय), 2019

ज़मीर बेच के आया हूँ

डॉ० अनिल चड्डा

मैं आज अपना ज़मीर बेच के आया हूँ, बदले में कुसंस्कार ले के आया हूँ। तार-तार हो रही समाज में अब अस्मिता, हर जगह खिल रहे काँटों के गुलिस्ताँ, काँटों को आज मैं फूल समझ के लाया हूँ। कौन गीत गायेगा जो रो रहे हैं, उनके लिए, बिक रहे बाजार में जो रोटी को, उनके लिये, आज उनके लिये नया संगीत ले के आया हूँ।


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