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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 57, मार्च(द्वितीय), 2019

भारतीय: भावुक भी भुलक्कड़ भी...!!

तारकेश कुमार ओझा

हम भारतीय भावुक ज्यादा है या भुलक्कड़..। अपने देश में यह सवाल हर बड़ी घटना के बाद पहले से और ज्यादा बड़ा आकार लेने लगता है। मीडिया हाइप या व्यापक चर्चा के नजरिए से देखें तो अपने देश व समाज में मुद्दे बिल्कुल बेटिकट यात्रियों की तरह पकड़े जाते हैं। आपने गौर किया होगा भारतीय रेल के हर स्टेशन पर ट्रेन खड़ी होते ही काले कोट वाले टिकट चेकरों की फौज की निगाहें अपने संभावित शिकार पर जम जाती है...। यात्रियों का रेला निकला और कोई एक शिकार काले कोट वालों की जद में जा पहुंचा तो फिर शुरू हो गई जांच - पड़ताल। इसके बाद भले ही दर्जनों की संख्या में बेटिकट यात्री काले कोट वालों के सामने से गुजरते हुए धड़ाधड़ निकलते जाएं... लेकिन जो इनके चंगुल में फंस गया तो समझो फंस गया...। जुर्माना या जेल जैसी जलालत भरी प्रक्रिया से गुजरने के बाद ही बेचारे की मुक्ति संभव है। इसी तरह ब्रेकिंग न्यूज या बर्निंग न्यूज की गिरफ्त में जो आया तो समझो बेचारे की सात पुश्तें तरने के बाद ही वह व्यापक चर्चा के चक्रव्यूह से निकल पाएगा। यह तो हुई हमारी भावुकता। अब बात करते हैं , भुलने की बीमारी यानी भुलक्कड़पन की... तो हमसे ज्यादा भुलक्कड़ शायद ही कोई हो। अपने आस - पास ऐसे अनिगनत चेहरे ही नहीं बल्कि स्थान भी हैं जो कभी सुपरस्टार के मानिंद सुर्खियों में रहते थे लेकिन काल चक्र में आज उनका नामलेवा भी नहीं बचा। 2011 के अन्ना हजारे के नेतृत्व में चला लोकपाल विधेयक आंदोलन तो आपको याद होगा। तब हजारे गांधी से भी बड़े नेता करार दिए गए थे। उनकी अंगुली पकड़ कर चलने वाले बंगले से महलों तक पहुंच गए लेकिन खुद बेचारे अन्ना के सितारे आज गर्दिश में है। कभी - कभार उनकी चर्चा महज उनकी अस्वस्थता को लेकर ही हो पाती है। न किसी की दिलचस्पी उनके विचारों को जानने में होती है और न उनके इस हाल के कारणों को समझने में। पुलवामा से लेकर बालाकोट प्रकरण तक के घटनाक्रम के बाद देश में उमड़े देशभक्ति के ज्वार को देख मुझे सुखद आश्चर्य हुआ। चीन या पाकिस्तान से पहले हो चुकी लड़ाइयों के किस्से मैने इतिहास में पढ़े और दूसरों से सुने ही हैं। लेकिन 199 का कारगिल युद्ध अच्छी तरह से याद है। तब भी माहौल कुछ ऐसा ही था। हालांकि प्रचार माध्यम या सोशल मीडिया तब इतने प्रभावी रूप में मौजूद नहीं था। फिर भी पुलवामा के बाद उत्पन्न परिस्थितियों की तरह ही गली - चौराहों तक देशभक्ति की मिसालें मन में आश्वस्ति पैदा करती थी। भारतीय क्रिकेट टीम के 20 - 20 और विश्व कप जीतने के बाद भी देशभक्ति की भावना कुछ - कुछ ऐसे ही हिलारे मार रही थी। लेकिन इस भावुकता पर लगता है हमारा भुलक्कड़पन हमेशा भारी पड़ता है। वर्ना क्या वजह है कि अभी कुछ दिन पहले तक सुर्खियों में रहे मी टू प्रकरण पर अब कोई बात भी नहीं करता। जबकि कुछ महीने पहले इस मुद्दे पर पुलवामा प्रकरण से भी बड़ा बवंडर उठ खड़ा हुआ था। अमूमन रोज ही दो - तीन सेलिब्रिटीज इसकी भेंट चढ़ रहे थे। बेचारे एक वजीर की कुर्सी इसकी आग में झुलस गई। निरीह और असहाय से नजर आने वाले गुजरे जमाने के कई कलाकार पेंशन पाने की उम्र में मी टू विवाद पर सफाई पेश कर रहे थे। उनके चेहरे पर उड़ रही हवाइयां उनकी हालत बयां कर रहे थे। लेकिन फिर अज्ञात कारणों से यह विवाद ठंडे बस्ते में चला गया। सोचता हूं आखिर यह कैसे हुआ। क्या मी टू के वादी और प्रतिवादी पक्षों के बीच कोई समझौता हो गया फिर नया मुद्दा मिल जाने से प्रचार तंत्र ने ही उसे परे धकेल दिया। कहीं समाज की दिलचस्पी मी टू विवाद में खत्म तो नहीं हो गई या फिर यह हमारे भुलक्कड़पन का नताजा है। संतोष की बात यही है कि मीटू के ठंडे बस्ते में चले जाने से इसकी आग में झुलसे हस्तियों को थोड़ी राहत तो मिली ही होगी। वाकई , ज्यादा नहीं मी टू से पुलवामा प्रकरण के बीच हुए घटनाक्रम के मद्देनजर मैं गहरे सोच में पड़ जाता हूं कि हम भावुक ज्यादा हैं या भुलक्कड़...।


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