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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 57, मार्च(द्वितीय), 2019

समाज शोधन में साहित्य की भूमिका

डॉ. सुबोध कुमार शांडिल्य

समाज राष्ट्र निर्माण का एक प्रमुख स्तम्भ है। जिस प्रकार स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का वास होता है, ठीक उसी प्रकार स्वस्थ समाज से ही स्वस्थ और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण सम्भव होता है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों द्वारा समाज को गति एवं दिशा प्रदान करने के लिए कई उपायों की खोज की गयी थी, उसमें शास्त्रों का अध्ययन व मनन भी एक प्रमुख था। वैसे तो इन शास्त्रों को धार्मिक ग्रंथ माना जाता है, लेकिन इन शास्त्रों में समाज को संतुलित रखने की दृष्टि का ही वर्णन किया गया है। कह सकते है कि इन धार्मिक ग्रंथो का निहितार्थ सामाजिक था। महात्मा गाँधी इस मर्म को समझ गये थे। यही कारण था कि वे राजनीति को धर्म से अलग नहीं करना चाहते थे। लेकिन परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। उतार-चढाव होते रहते हैं। इसी उतार-चढाव में समाज सांस्कृतिक, नैतिक, वैचारिक व आध्यात्मिक अधोगति की ओर अग्रसर हो गया जो चिंता का प्रमुख कारण है। वर्तमान युग में विज्ञान ने काफी प्रगति की है। इससे आधुनिक सुख-सुविधाओं में काफी वृद्धि हुई है। लेकिन इस सम्पन्नता ने कई सामाजिक विकृतियों को जन्म भी दिया है। यदि समय रहते इन विकृतियों व समस्यायों को दूर नहीं किया गया तो

समाज सांस्कृतिक, नैतिक, आध्यात्मिक व वैचारिक रूप से विपन्न हो जायेगा। विपन्नता को रोकना है तो जीवन में साहित्य को हृदयंगम करना होगा। साहित्य के संजीवनी शक्ति से समाज को शोधित कर नई ऊर्जा का संचार करना होगा। जैसे आयुर्वेद रोग के निदान के साथ-साथ स्वस्थ रखने में मदद करता है, ठीक वैसे ही साहित्य भी सामाजिक विकारों का रेचन कर समाज को प्रफुल्लित रखने में सहायक सिद्ध है।

वर्तमान समय में युवा पीढ़ी उच्चश्रृंखल एवं दिशाहीन होता जा रहा है। मूल्यहीन शिक्षा ने उसमे भोगवादी प्रवृति को जन्म दिया है। नैतिक शिक्षा के अभाव में मानव-चरित्र का पतन हुआ है। बलात्कार जैसे घटनाओं में वृद्धि का कारण मूल्यहीनता व नैतिकता का अभाव ही है। आज के युवा पीढ़ी आधुनिकता एवं भौतिकता के चकाचौंध में सिर्फ धन संचय को ही अपना अभीष्ट मान बैठा है। इसके लिए वह किसी भी हद से गुजरने के लिए तैयार रहता है। युवा पीढ़ी के इसी विकृत सोच ने सामाजिक मूल्यों व मानवीय मूल्यों के विघटन को बढ़ावा दिया है। यदि युवा पीढ़ी को समाज एवं राष्ट्र के निर्माण की ओर प्रवृत्त करना है तो उसे साहित्य के सान्निध्य में अपने नैतिक कर्तव्यों एवं सामाजिक मूल्यों सहित उतरदायित्व के बोध को जाग्रत करना होगा। साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, अपितु पथ-प्रशस्तक भी है। साहित्य के अध्ययन के माध्यम से युवा पीढ़ी के कुंठा, संत्रास एवं नैतिक पतन को समाप्त कर मूल्य सहित शिक्षा का संचार किया जा सकता है। प्राचीन वांग्मय से लेकर आधुनिक साहित्य तक चाहे वह किसी भी भाषा में क्यों न हो एक संतुलित जीवन जीने का मार्ग सुझाता है। साहित्य के अध्ययन से स्व के कर्तव्य एवं दायित्व का बोध तो होता ही है, पर के दुखों व समस्याओं का भी भान होता है। वास्तव में यदि साहित्य का अध्ययन व मनन किया जाय तो काफी हद तक सामाजिक विकृतियों का विनाश किया जा सकता है।

वस्तुतः साहित्य एक विषय ही नहीं है बल्कि विभिन्न विषयों को अपने विस्तृत फलक में समेटे हुए विषयों का विषय है। विश्व में चाहे जितनी भी विषयों की पढाई होती हो उन सभी का प्रकटीकरण साहित्य के माध्यम से ही होता है। साहित्यकार एक अतिसंवेदनशील प्राणी होता है। उससे समाज की कोई भी गतिविधि छुपी हुई नहीं रहती है। वह समाज में घट रहे घटनाओं का सूक्ष्मता के साथ अवलोकन करता है तथा उसके प्रभाव का अध्ययन कर समस्याओं की ओर ध्यान आकृष्ट करता है। वह समस्याओं के प्रभाव को इंगित कर समाधान भी सुझाता है। इतना ही नहीं वर्तमान के परिलक्षण से अनुमान कर भविष्य में उत्पन्न होनेवाली संकट से भी आगाह करता है। लेकिन अफसोस है कि आज की वर्तमान पीढ़ी ऐसे ही समय जाया करने में लगा है। उसका अधिकांश समय सोशल साईट पर या तो चैटिंग करने में या गेम खेलने में व्यतीत हो जाता है। बचे हुए समय को वह भोंडा नृत्य व संगीत का मजे लेने तथा दूसरों के निंदा-शिकायत में व्यतीत कर देता है। लेकिन उसके पास साहित्य का आनन्द लेने का अवसर नहीं होता। वह साहित्य के अध्ययन से भागता है। और तो और पुराने विचार रखने वाले व्यक्तियों में भी साहित्य के प्रति रुचि का अभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। स्पष्टतः यह शुभ संकेत नहीं है। यदि समाज व राष्ट्र को गर्त में जाने से बचाना है तथा उन्नति के मार्ग पर ले जाना है तो ‘साहित्यम् शरणम् गच्छामि’ के महामंत्र को जीवन में आत्मसात् करना होगा। वर्तमान समय में लोगों के पास संसाधनों की कमी नहीं है। हाँ, कुछ अपवादें हैं। लेकिन शांति किसी को नहीं है। वह अपने संसाधनों से शांति को खरीदना चाहता है। इस चक्कर में वह तथाकथित बाबाओं के जाल में आसानी से फँस जाता है। ऐसे में धन का अपव्यय तो होता ही है, शांति भी नहीं मिलती। यदि वे दिनचर्या में साहित्य के अध्ययन को समाहित कर लें तो धीरे-धीरे उनका मनःस्थिति शांत होने लगेगा, तनाव से मुक्ति मिलने लगेगी तथा अंततः शांति की प्राप्ति भी होगी। ऐसा इसीलिए कि साहित्य में वह सभी चीजें हैं जो मानव का चित शांत कर जिज्ञासा की तृप्ति करता है तथा जीवन में आनंद रस का रसपान कराकर जीवन को धन्य कर देता है। जैसे ही चित को शांति की अनुभूति होती है, सभी समस्यायों का समाधान स्वयमेव मिलना शुरु हो जाता है। प्राचीन साहित्य से लेकर अर्वाचीन साहित्य का अध्ययन यदि मनोयोग से किया जाय तो जीवन के समीकरण को संतुलित कर समाज एवं राष्ट्र के निर्माण में महती भूमिका का निर्वहन किया जा सकता है।

अस्तु साहित्य के अवगाहन और जीवन में उसके मूल्यों को आत्मसात् करने से ही समृद्ध और सुसंस्कृत समाज व राष्ट्र का निर्माण सम्भव है। समाज में उत्पन्न विकारों का रेचन साहित्य के द्वारा सम्भव है। यदि जीवन को साहित्य से आलोकित कर दिया जाय तो समाज व राष्ट्र स्वयं प्रकाशित हो जायेगा। साहित्य के सामीप्य से समाज शोधित होकर चैतन्य होगा एवं चहुँओर खुशहाली का प्राकट्य होगा।


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