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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 57, मार्च(द्वितीय), 2019

*प्रखर देशभक्त :- चन्द्रशेखर आज़ाद*
संदर्भ:- पुण्य तिथि 27 फरवरी

राजेश कुमार शर्मा"पुरोहित"

अब भी जिसका खून ना खोला वो खून नहीं पानी है जो देश के काम न आये वो बेकार जवानी है।"दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे।आज़ाद ही रहे आज़ाद ही रहेंगे।" ये नारा था अमर शहीद महान क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद का। आज़ाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को भाबरा मध्यप्रदेश में हुआ था। वह एक साहसी स्वतंत्रता सेनानी थे। काकोरी ट्रेन डकैती, विधानसभा मद बम की घटना, लाला लाजपतराय की हत्या का बदला उन्हीं ने ब्रिटिश सरकार से लिया था। उन्होंने एक बार संकल्प कर लिया कि मैं अंग्रजो के हाथ नहीं आऊँगा। तो अंत समय तक पुलिस के हाथ नहीं आये।लाहौर में उन्होंने सांडर्स की हत्या कर दी थी।ऐसा क्रांतिकारी जो निडर था। पंडित सीताराम उनके पिताजी थे।जगरानी उनकी माताजी थी। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा भाबरा में हुई। उच्च शिक्षा के लाइट वाराणसी संस्कृत पाठशाला में अध्ययन किया।

बहुत ही कम उम्र में ही वह क्रंक्तिकारी बन गए। उन्हें जब ऐसी गतिविधियों में लिप्त देखा तो अंग्रेज सरकार ने उन्हें पन्द्रह कोड़े मारने की सजा दी। इस घटना के बाद ही चंद्रशेखर ने आज़ाद की पदवी धारण कर ली। वे अब चन्द्रशेखर आज़ाद के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

चोरी चोरा घटना व असहयोग आंदोलन के गांधी जी के निलंबन से मोहभंग हो गया था। वे ग्राम दल में बदल गए। आज़ाद समाजवादी थे। अन्य क्रांतिकारियों से मिलकर इन्होंने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन बनाया। वे भगतसिंह जी जैसे क्रांतिकारियों के परामर्शदाता रहे। वे किसी भी तरह से सम्पूर्ण आज़ादी चाहते थे। लाला लाजपतराय का बदला लेना उनका मकसद था। उन्होंने अंग्रेज सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन पायंट्स साण्डर्स को मार डाला। जीवित रहते हुए वे अंग्रेज सरकार के लीटर आतंक का पर्याय रहे। उनके साथियों ने उनसे एक बार धोखा कर लिया जिसके कारण उन्हें 27 फरवरी 1931 को अल्फ्रेड पार्क इलाहाबाद में ब्रिटिश पुलिस ने घेर लिया। उन्होंने बड़ी बहादुरी से उनका मुकाबला भी किया। लेकिन कोई दूसरा रास्ता न मिलने के कारण उन्होंने खुद को गोली मार ली। और एक आज़ाद आदमी के तौर पैट मरने के अपने संकल्प को पूरा किया। आज़ाद चले गए लेकिन भारत को अंग्रेजों से हमे आज़ादी दिला गए। धन्य है ऐसे भारत माता के वीर सपूत। आज़ाद अमर हैं। अमर ही रहें। वे आज भी करोड़ों भारतीयों के नायक हैं। हमारे आदर्श हैं।

नेहरू जी ने अपनी कहानी में लिखा था" ऐसे ही कायदे कानून तोड़ने के लिए एक छोटे से लड़के को जिसकी उम्र 15 या 16 साल की थी।जो अपने को आज़ाद कहता था।बेंत की सजा दी गई।वह नंगा किया गया।और बेंत की टिकटी सर बांध दिया गया। जैसे जैसे बेंत उस पर पड़ते थे। और उसकी चमड़ी उधेड़ डालते थे।वह भारत माता की जय चिल्लाता था।हर बेंत के साथ वह लड़का तब तक यही नारा लगाता रहा जब तक वह बेहोंश न हो गया। बाद में वही लड़का सबसे बड़ा क्रंक्तिकारी आज़ाद बन गया।

27 फरवरी के दिन वीरगति हुई। इस दिन की घटना इतिहास में दर्ज हो गई। अल्फ्रेड पार्क में जैसे ही आज़ाद के निधन की बात फैली। लोग जिस वृक्ष के नीचे उनका शरीर छूटा उसे पूजने लगे। बृक्ष के तने पर झण्डियां बांध दी। ऐसे थे आज़ाद।

आओ झुक कर सलाम करें उनको जिनके हिस्से में मुकाम आता है।खुशनसीब होते हैं वो लोग।जिनका लहू इस देश के काम आता है।


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