साहित्यकारों की वेबपत्रिका
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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 57, मार्च(द्वितीय), 2019

ईश्वर एक सच्चाई या लालच

अनुज गुप्ता

समय बदलता गया‚ कभी सतयुग था और आज कलयुग आ गया। ईश्वर का नाम कल भी था और आज भी है‚ लेकिन ईश्वर की पहचान बदल गई जो कल तक श्रद्धा और सच्चाई के रूप मे जाना जाता था आज वह डर और लालच का प्रतिरूप हो गया है।

पहले ईश्वर के प्रति लालसा और लालच नहीं बस एक श्रद्धा और साधना थी इन्सान संतुष्ट था की जो है वह बहुत है‚ अच्छा है और सब ईश्वर का दिया है। आज के परिपेक्ष मे देखे तो बहुत अंतर है लोगो के पुजा पाठ मे एक लालच है और अपने इच्छाओ की एक सूची है जिसे पूरा करना चाहता है। इन्सान स्वम से संतुष्ट नहीं है वह एक अंधी दौड़ मे शामिल है‚ जिसमे उसे खुद भी मंज़िल का पता नहीं बस दौड़ना है कब तक ये भी नहीं मालुम।

पहले इंसान पूजा करता था ईश्वर को धन्यवाद देने के लिये “आपने जो दिया अच्छा दिया और आपका बहुत शुक्रिया”। आज इंसान पुजा करता है ईश्वर से मागने के लिया जिन इच्छाओ से वह भरा है और परेशानियों से मुक्ति के लिये जिनसे वह परेशान है।

पहले इंसान ईश्वर के अस्तित्व को मन से स्वीकार करता था और उसे महसूस करता था। भविष्य मे आने वाली किसी भी समस्या या मुसीबत का सामना ईश्वर के साथ होने की आशा के कर लेता था। अब ईश्वर का अस्तित्व मानता है‚ पर स्वीकार नहीं करता या उसके साथ होने से इंकार करता है। अकसर सुना होगा समस्या से जूझते हुये लोगो को यह कहते हुये “हमारी तो भगवान भी नहीं सुनता ना जाने कब हमारी परेशानिया खत्म होगी” भुल जाता है की समय अच्छा हो या बुरा ईश्वर तो हमेशा सभी के साथ है।

आज लोगो मे ईश्वर को लेकर एक डर की भावना है‚ ईश्वर के नाराज होने का डर है। इंसान को लगता है की ईश्वर नाराज हुये तो वह उसे सजा देंगे या उसका बुरा करेंगे। पुजा पाठ करते हुआ भी सोचता है की पुजा−पाठ मे कोई गलती न हो नहीं तो सब बुरा होगा। पहले ऐसा नहीं था ईश्वर के लिए मंदिर जाना ही जरूरी नहीं था वह हर जगह है यही सोच थी उसे कही भी याद कर लेता था‚ ईश्वर और मनुष्य एक जुड़ी हुई कड़ी की तरह थे।

इंसान जैसे हर वस्तु या पहलु के बारे मे सोच कर एक चित्र दिमाग में बनाता है वैसे ही उसने ईश्वर का भी बनाया पर कुछ इंसान के रूप में ही। ईश्वर पुजा−पाठ से प्रसन्न होंगे‚ उन्हे फल‚ फूल और मिठाई पसंद है या बहुत कुछ वैसे ही जैसे इंसान स्वमं है‚ इंसान भी अपनी इज्ज़त और प्रसंशा चाहता है और स्वादिष्टता उसकी भी कमजोरी है। यदि ईश्वर भी कुछ ऐसा हुआ तो वह ईश्वर नहीं रह जायगा वह भी इंसान ही बन जाएगा।

ईश्वर कभी किसी से कुछ नहीं चाहता है वह सिर्फ देना जानता है और वह नहीं कहता स्वम की पुजा करने के लिया। ईश्वर तो सब के लिये एक ही है चाहे गरीब हो जो सिर्फ ईश्वर को याद करने मे सक्षम है या अमीर हो जो पुजा−पाठ के लिये हजारों खर्च करने मे सक्षम हो। दैनिक जीवनचर्या की जरूरी वस्तुओ की व्यवस्था दोनों के लिये एक समान रूप से करता है। इस प्रक्रति की रचना ईश्वर ने की है जिसमे हम भी आते है और इस प्रक्रति की देखभाल भी वही करता है‚ इसलिये वह सब को समान नजरिये से देखता है। वह सब के लिये अच्छा हे करता है बिना किसी भेदभाव के चाहे कोई उसे पसंद करे या नहीं इससे उसे कोई सरोकार नहीं।

आज और अभी से आप और हम सभी मिलकर ईश्वर के स्वरूप को जो हमारे जहन मे बसा है‚ उसे बदले। उसके सच्चे स्वरूप को समझे और उसके संदेश को पहचाने जो वह हमे देना चाहता है। अपने समाज को फिर से कलयुग से सतयुग की ओर ले जाने का मिलकर संकल्प लें और अपने आगे आने वाली पीड़ी के लिये एक बेहतर समाज की रचना करने की शुरुआत करें।


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