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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 57, मार्च(द्वितीय), 2019

नालायक

राजीव कुमार

रामलाल जी अपने इकलौते बेटे को नालायक तो शुरू से ही कह रहे थे, लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद नालायक शब्द उनके लिए तकिया कलाम बन गया। हर बाल नालायक शब्द का इस्तेमाल करने के बाद उनका पारा बढ़ जाता। पत्नी की अकस्मात् मृत्यु के बाद मन ही मन उन्होंने अपनी बेटी के साथ रहने का मन बना लिया।

नालायक बेटे ने प्रेम विवाह करके सारी आशाओं पर पानी फेर दिया था। कुछ रुपए इकलौते बेटे को देने के बाद रामलाल जी ने अपनी बेटी के ससुराल में अड्डा डाल दिया।

उनका भाग्य ही वहां तक ले गया और दामाद जी ने भी अनुनय-विनय करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

भविष्य निधि का सारा रुपया अपने खाते में जमा करवाने के एक सप्ताह के भीतर ही दामाद की आंखों में गड़ने लगे।

बेटी तो गूंगी बन चुकी थी, सिर्फ रो सकती थी, विधवा होने की कसम से डरी हुई थी बेचारी। एक दिन दामाद ने नालायकी की सारी हदें पार करते हुए, ससुर की थाली दूर फेंकते हुए कहा, ‘‘यहां कोई धर्मशाला नहीं खोल रखी है मैंने।’’ रामलाल जी के गुस्से को भी शाॅक लगा था। आज रामलाल जी अपने इकलौते, नालायक बेटे के घर में अंतिम सांसें गिन रहे हैं और यही प्रश्न उनको इस परिस्थिति में लाया कि नालायक कौन? बेटा? दामाद? या स्वयं मैं?


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