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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 57, मार्च(द्वितीय), 2019

बेटी

डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट

बीडीओ साहब की ईमानदारी के चर्चे दूर दूर तक थे।किसान मजदूरों के लिए उनका दिल धड़कता था।जब भी गांव के विकास की कोई योजना आती ,बीडीओ साहब चाहते उसका लाभ दूरस्थ गांव के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचे।तभी तो जब उनकी सरोज के साथ शादी हुई तो उनके इलाके के बहुत से लोग बिन बुलाये ही आ गए थे।उन्होंने बीडीओ साहब को न सिर्फ शादी का न्योता न मिलने का उल्हाना दिया ,बल्कि ढेरो बधाइयां भी दी।जो भी शादी के बाद बीडीओ साहब और उनकी अर्धांगनी सरोज को देखता ,उनकी सुंदर जोड़ी की तारीफ तो करता ही, साथ ही उन्हें पुत्र होने का आशिर्वाद भी देता।हालांकि बीडीओ साहब की दिली इच्छा थी कि उनके घर बेटा नही, बेटी जन्मे परन्तु सरोज मन मे बेटा होने की चाहत रखती थी।फिर एक दिन ऐसा भी आया ,जब उनके घर एक कन्या ने जन्म लिया।बीडीओ साहब बेहद खुश थे अपनी पहली सन्तान के रूप में बेटी को पाकर। परन्तु सरोज का चेहरा लटका हुआ था।हालांकि एक माँ होने के नाते उसने बेटी की जीभरकर देखभाल की और नामकरण भी मंजू किया ।मंजू के पालन पोषण व पढाई में भी कोई कमी नही रही ।लेकिन जब तक मंजू का भाई नही आ गया ,तब तक माँ सरोज स्वयं को पूर्ण माँ के रूप में स्वीकार नही कर पा रही थी।कई बार बीडीओ साहब ने सरोज से पूछा भी कि वह बेटा ही क्यो चाहती है।उनका जवाब होता,बेटी का क्या है ?एक दिन ससुराल चली जायेगी।बेटा ही तो हमारे बुढ़ापे का सहारा बनेगा।शायद इसी सोच के कारण सरोज खुलकर न सही, लेकिन परोक्ष रूप में बेटे को बेटी से अधिक प्राथमिकता देती थी।जो कई बार बीडीओ साहब को भी अखरता था ।परंतु वे कुछ बोले बिना सरोज के इस व्यवहार को नजरअंदाज कर देते थे।धीरे धीरे समय ने करवट बदली और बेटी मंजू के साथ- साथ बेटे विशाल का भी विवाह हो गया।लेकिन एक दिन बीडीओ साहब को अचानक ऐसा हार्ट अटैक आया कि उनकी जान नही बचाई जा सकी।पल भर में सरोज की दुनिया ही बिखर गई।नाती रिश्तेदारो ने सरोज को ढांढस बंधाया कि बेटी घर बार की हो गई। एक होनहार बेटा है,जो सरोज के बुढापे की लाठी बनेगा।इसी आशा में सरोज ने हालात से समझौता कर लिया और बेटे बहु के पास जाकर रहने लगी।

लेकिन यह क्या, बीडीओ साहब क्या गए?बेटे विशाल और पुत्रवधु अरुणा का व्यवहार ही बदल गया।उन्हें केवल माँ की पेंशन ,जो बीडीओ साहब के निधन के बाद उन्हें मिलनी शुरू हुई थी,को झटकने से मतलब था।उनके लिए माँ अब माँ नही थी,एक नोकरानी भर थी जो सारा दिन रसोई में उनका खाना बनाती रहे,झाड़ू,चौका, बर्तन करती रहे और बेटा बहु माँ की पेंशन को उड़ाने में लगे थे।इतने तक सीमित रहता तो भी गनीमत होती लेकिन बहु और बेटे की हरकतें माँ के स्वाभिमान को भी ठेस पहुंचा रही थी।बात बात पर माँ से झगड़ना,उनके साथ दुर्व्यवहार करना उनके लिए रोजमर्रा का काम हो गया था।एक दिन तो हद ही हो गईं माँ रसोई में अपने लिए चाय बना रही थी,तभी बहु आई और तमतमाती हुई बोली,सारा दिन चाय ही पीती रहती हो ।काम की न काज की पैसर अनाज की।माँ कुछ बोल पाती उससे पहले ही बहु ने गुस्से में चाय का भगोना उठाकर माँ के सिर में दे मारा।यह क्या माँ लहूलुहान हो चुकी थी,उसी समय माँ सरोज के भाई अचानक वहां पहुंच गए और अपनी बूढी बहन की यह दुर्दशा देखकर ,उनका मुहं कलेजे को आ गया।वे अपनी बहन यानि सरोज को उसी समय केवल पहने कपड़ो में अपने घर ले आएं।माँ ने भी जिंदगी भर मायके में ही रहने का फैसला कर लिया।माँ की घर से डोर क्या टूटी ,भाइयो के लिए उनकी बहन मंजू भी पराई हो गई।एक ही शहर में रहने पर भी एक ही परिवार के लोग अजनबियों की तरह रहने लगे।अब माँ अपने मायके में रहकर सन्तुष्ट थी,तो बेटी ने भी भाइयो के घर के बजाए मामा के घर को ही अपना मायका मान लिया था।समय गुजरता गया ।परिवार की दूरियां घटने के बजाए बढ़ती चली गई ।माँ ने भी सांसारिक मोह माया से परे हटकर आध्यात्मिक मार्ग पर चलना शुरू कर दिया।फिर एक दिन ऐसा भी आया जब माँ को एक जानलेवा बीमारी ने अपनी चपेट में ले लिया और लाख कोशिशों के बाद भी माँ को बचाया नही जा सका।अपने आखिरी वक्त में माँ ने बेटी मंजू को बुलाकर उसे उसके जन्म की दास्तां सुनाई कि वह पहली संतान पुत्र चाहती थी लेकिन तेरे पिता बेटी हो,यह ख्वाहिश रखते थे।ऊपर वाले ने तेरे पिता बीडीओ साहब की सुनी और बेटी के रूप में तेरा जन्म हुआ।सच तेरे आने से ज्यादा खुश नही थी,चाहती थी हमारे बुढापे का सहारा बेटा पहले आये परन्तु मेरी यह सोच गलत थी।जिसे मैं बुढापे का सहारा समझ रही थी वह तो धोखा दे गया लेकिन मेरा भाई और मंजू बेटी ही मेरी खेवनहार बनी। जिन्हें मैं अपने से दूर मान रही थी।माँ ने बेटी मंजू को अपनी आखिरी एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपते हुए कहा कि उसका अंतिम संस्कार बेटा नही ,मेरी बेटी मंजू करेगी जो बेटे से बढ़कर सिद्ध हुई है।वही हुआ भी ,माँ सरोज ने शरीर छोड़ा ,तो बेटी मंजू ने बेटा बनकर माँ का न सिर्फ अंतिम संस्कार किया बल्कि परिवार की पगड़ी का दायित्व भी अपने कंधों पर उठाया।सच मे बेटी बेटो से बढ़कर है और माँ बाप का अभिमान भी।


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