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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 57, मार्च(द्वितीय), 2019

फूल

सविता अग्रवाल “सवि”

सुन्दर रंग बिरंगे फूल संग में रहते इनके शूल धरती पर नये रंग बिखेरें तितलियाँ करती इनके फेरे दिन भर सूरज से बतियाते शाम ढले पर ये सो जाते पाकर शबनम की बूंदों को पांखुरी पर मोती बन गाते कोमल होती इनकी देह हर कोई करता इनसे नेह देख कर इनके रंग निराले बालक झूमें हो मतवाले फूलों की खुशबू है न्यारी महकी इनसे क्यारी-क्यारी तोड़ इन्हें जब माली लाता सुन्दर सुन्दर माल बनाता फूलों की इन मालाओं से मानव अपने घर को सजाता


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