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वर्ष: 3, अंक 56, मार्च(प्रथम) , 2019



कहीं कोई गाँव तो उजड़ा होगा


सलिल सरोज


       
यह जो नया शहर बसा है यहाँ
कहीं कोई गाँव तो उजड़ा होगा

ज़मीं बेआबरू होकर बंजर हुई
टिड्डों का काफिला गुज़रा होगा

शेख साहब महफ़िल में आ बैठे
अब दुआओं में भी मुजरा होगा

यहाँ हवाएँ बहुत शान्त लगती हैं
पास जरूर दर्द का हुजरा* होगा

दो लोग बैठे और फैसला हो गया
बेटी की किस्मत का माजरा होगा

यहाँ जिसे चलानी है,चल जाएगी
मुर्दों को तकलीफ नहीं जरा होगी

*हुजरा-कोठरी
 

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