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वर्ष: 3, अंक 56, मार्च(प्रथम) , 2019



विकास


कुमार गौरव


"भैया प्रणाम ।"

"प्रणाम प्रणाम ।"

"कौन बोल रहे हैं?"

"भैया हम राम भरोसे। पहचाने कि नहीं?"

"अरे क्यों नहीं पहचानेंगे। इस युग में जब सब कोई अपने जुगाड़ में लगा हुआ है । तब भी तुम रामभरोसे बने हुए हो यह कोई छोटी बात है जो तुमको भूल जाएंगे। और सुनाओ हालचाल सब ठीक है?"

"क्या कहें भैया मेरी जिन्दगी तो रामभरोसे कट गई, लेकिन मुझे तो इस विकसवा की चिंता खाये जाती है। ऐमे ओमे सब कर लिया है लेकिन काम धंधा का कोई ठौर ठिकाना नहीं है। गाँव टोला के सब लड़का बच्चा को भर दिन चराता रहता है कहता है ट्यूशन पढ़ाते हैं। पचास रूपया महीना देता है सब । बताइए इससे जिंदगी चलने को है?"

"हम तो छठ में मिले थे तब कहे थे दिल्ली आ जाओ। आजकल ओला उबर बहुत डिमांड में है। एक आल्टो या वैगनआर निकाल देंगे, तुम चलाना। लेकिन हूं हां करके रह गया।"

"अरे मत पूछिए भैया केतना बार ठेल के भेजे हैं जाता है और शाम को लौट आता है। कहता है दिल्ली जानेवाली ट्रेन अपने स्टेशन पर नहीं रूकती। दो तीन बार में हम समझ गये कि बहाना मार रहा है। एक बार हम खुद लेके गये स्टेशन, सच में इक्का दुक्का ट्रेन रूकती है। लेकिन एक पूरबिया एक्सप्रेस करके रूकी तो गेट पर करिया कोट वाला सब खड़ा था। लगा चिल्लाने ..ये रिजर्व डिब्बा है जनरल में जाओ। जनरल में तो .. हो भैया इतना भीड़ .. हम डर गये। हमीं मना कर दिये..छोड़ो जिस दिन भीड़ कम होगी उस दिन जाना।"

"बैठा के उसको प्रेम से पूछिए। क्या करना चाहता है जीवन में । एमए तक पढ़ा है बेवकूफ थोड़े है। उसको कुछ और करना होगा आपको बता नहीं पाता होगा।"

"अरे वह भी कर के देख लिए ..कहता है केवल आपके बेटे का नाम विकास रख लेने या उसके एमए कर लेने से गाँव का विकास नहीं होगा। उसके लिए गाँव के हर घर के लोगों को पढ़ना होगा। इसलिए मैं यहीं रहकर इन सबको पढ़ाऊंगा। "

"विचार तो बड़ा आदर्श है चाहते तो हमलोग भी जवानी में ऐसा ही थे लेकिन मोहमाया के चक्कर में उलझ गये । हो सके तो उसको मत रोको । भगवान तुमसे भी खूब बदला लिये हैं तुम रामभरोसे जीवन काट लिये और तुम्हारा औलाद गाँव की चिंता में डूबा है। सारा झंझट तुम्ही बोए हो। हमको आज भी याद है भौजी विक्की नाम रखी थी तो तुम भड़क गये थे हाँ ज्यादा अंग्रेज मत बनो इसका नाम विकास होगा विकास। अब अपने देश में तो विकास ऐसा ही होता है। "


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