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वर्ष: 3, अंक 56, मार्च(प्रथम) , 2019



सुबह के अखवार में


प्रभुदयाल श्रीवास्तव


  
क्या- क्या छपा,लिखा क्या- क्या है,
सुबह के अखबार में।

        एक राह चलती महिला का,
        छीना हार झपट्टे से।
        स्कूटी से जाती लड़की,
        फँस कर गिरी दुपट्टे से।
        कुत्ता मरा एक मंत्री का,
        जूड़ी ताप बुखार में।

शाला की बस गिरी खाई में,
बच्चे दबकर मर गए बीस।
पिटी एक बच्ची टीचर से,
चुका न जो पाई थी फीस।
चाँदी चढ़ गई सोना लुढ़का,
रंगों के त्यौहार में।

         मुनियाँ यह सब पढ़ती है तो,
         उसे अजूबा लगता है।
         रोज- रोज अखवारों में क्यों,
         उल्टा सीधा छपता है।
         क्या सचमुच में ऐसा होता,
         होगा इस संसार में !
 

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