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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

फेसबुक फ्रेंड !

अशोक वाधवाणी

जुगनू की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गयी। उनकी याद में शोक सभा का आयोजन किया गया। बड़ी संख्या में उसके रिश्तेदार, परीचित, पडोसी और शुभचिंतक मौजूद थे। जुगनू को चाहने, मानने वाला फेसबुक फ्रेंड आलोक उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए उठ खड़ा हुआ। बोलने से पहले ही उसका गला रूंध गया। कंपकंपाते स्वर में दुखी होकर कहने लगा , “ जुगनू जी के बारे में आपको क्या बताऊँ ……….. मेरे 1760 फेसबुक फ्रेंडों में से एक अकेले ऐसे परम मित्र थे , जिन्होंने मेरी हर पोस्ट को लाइक किया। मेरी आधी से ज़्यादा पोस्ट को शेयर करने जैसा सराहनीय कार्य किया। आपको बताऊँ, विस्तारपूर्वक टिप्पणियाँ लिखना तो कोई उनसे सीखे। कुछ नमूने पेश हैं , सामने वाले को दाद देनी हो, हिम्मत, हौसला बढ़ाने हेतु कहते, वाह! वाह! क्या बात है! सामाजिक सरोकार से जुड़ा अच्छा, अनूठा काम करने वाली पोस्ट पर ऐसी टिप्पणी करते अभिनंदनीय, अनुकरणीय, प्रशंसनीय और वंदनीय। धार्मिक, आध्यात्मिक, भावनात्मक पोस्ट पर टिप्पणी करते सटीक, सार्थक, सुंदर संदेश। तथ्यपूर्ण, नयी जानकारी दिखती तो उनका उत्साह बढ़ाने हेतु उत्साहवर्धक, मनोरंजक, मार्मिक और ज्ञानवर्धक लिख देते थे। नपे – तुले शब्दों में टिप्पणी करने से उन्हें सख्त चिढ़ थी। लोग उनकी अलग अंदाज़ वाली टिप्पणियों को लाइक करना अपना परम कर्तव्य समझते थे। उनकी भेजी गयी चुनिंदा इमोजी लाजवाब , बेमिसाल होती थी। बिना बोले बहुत कुछ कहने में समर्थ होती थी। किस पोस्ट पर कब, कौन सी, कैसी इमोजी भेजनी है , इसका विशेष हुनर था उनके पास। उन्होनें अपने वाल पर कभी कोई पोस्ट नहीं लिखी। सदैव सारा समय लोगों की पोस्ट को लाइक करने, कमेंट करने और शेयर करने में ही गुजारा। एफ बी के इतिहास में उनका नाम आदर, मान-सम्मान के साथ लिया जाएगा। फ़ेसबुक के संस्थापक ने भी एक बार उनकी भूरी – भूरी प्रशंसा की थी। निस्वार्थ भाव से जीवन जीने वाले ऐसे मनुष्य विरले ही जन्मतें हैं धरती पर…………. आलोक आगे कुछ बोल न सका। भीगी आंखों से बुत बना खड़ा रहा।


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