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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

नियति का बदला

अमर'अरमान'

'हे ज़गत माता प्रकृति ! वसुधा पर यह विनाश का कैसा जलज़ला आया हुआ है?अगर यह ऐसे ही चलता रहा।तो वह दिन दूर नहीं जब यह अनुपम धरा मानवहीन हो जाएगी और इस खूबसूरत रत्नगर्भा के हृदय पर से मानव का अस्तित्व सदा -सदा के लिए मिट जाएगा।' मृत्यु के विबुध ने चिन्तित होते हुए कहा।

'हे मृत्यु के देवता!आपका कार्य तो (आम खाने से है गुठली गिनने से नहीं) लोगों को मुक्ति देने से है उसकी मृत्यु का असबाब जानने से नहीं क्योंकि यह सब मेरे कार्य क्षेत्र का विषय है।'प्रकृति ने थोड़ा नाखुश होते हुए कहा।

'क्षमा चाहता हूँ माते! मेरे कहने का यह औचित्य कदापि ना था ।कदापि यह मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर है फिर भी हे जगत माते! मैं इस विनाश की वजह जानना चाहता हूँ? कृपा करके तात की ज़िग्यासा शांत करे?' यम ने विनय करते हुए कहा।

'हे महाकाल! तुम मेरी ही रचना का अभिन्न अंग हो, इसलिए तुम्हें यह सब जानने का पूर्ण अधिकार है।इसलिए हे पार्थ ! आज मैं तुम्हें इस विनाश की उस गाथा को विस्तार से बताती हूँ जिसके विनाश की नीव खुद मानव के द्वारा रखी गई है।'कह कर उन्होंने इस गाथा को सुनाना प्रारम्भ किया।

एक दिन की बात है।जब मैं सृष्टि के विकास और विनाश के विचारो में उलझी हुई थी।तभी मैंने बोसीदा वस्त्रों में लिपटे हुए बदहाल अग्नि देव को अपनी और आते हुए;पूछा- 'हे जगत को ऊष्मा देने वाले वैश्वानर! आपकी ऐसी दशा किसने और क्यों की?

हे जीवन ज्योति! आप तो सर्वत्र हो, फिर भी मैं आपको बताता हूँ। यह करतूत धरा पर आपकी सबसे खूबसूरत और सर्वोच्च कृति मानव की है। हे जननी! मेरा सृजन तो देव और मानव के मध्य मध्यस्त्तता के द्वारा ब्रह्माण्ड में ऊर्जा का संचार कर चर -अचर वस्तुओं में बृद्धि और विकास करने के लिए हुआ था किन्तु इस लालची और दन्भी मानव ने भौतिक सुखों की चाह में( इस बात को भूल कर की प्रकृति के बिना उसके जीवन का कोई मोल नहीं)इस बात से अनजान बन मेरे जीवन के साथ ही साथ अपना जीवन भी …बर्बाद.. कर...डाला…..?

अभी धनंजय की बात सम्पन्न भी ना हो पायी थी तभी त्राहि- माम,त्राहि-माम की ध्वनि के साथ फटे - पुराने कपड़ों जिसमें (मानव द्वारा सृजित) तमाम प्लास्टिक की पन्नियाँ, व बोतलें चिपकी हुई थी जिनसे सड़ी हुई दुर्गन्ध आ रही थी जिसकी वजह से जिस्म अनगिनत फोड़े फुन्सियो से भर हुआ था जिस पर सैकड़ों मक्खियाँ भिनभिना रही थी।

उन्हें देखकर मैंने अग्निदेव से पुछ-'हे ज़ातवेद! ज़रा चीन्ह कर बताओ कि यह मैला-कुचैला फ़कीर सा व्यक्ति कौन है ?

अग्नि देव को पहचानते देख कर-मैने पुनः टोकते हुए पुछा-'हे हिरण्यरेता! क्या आप इन्हें पहचानते हैं?

प्रकृति के मुख से ऐसी बातें सुनकर- मेघपुष्प के नेत्रों से नीर बह निकला उन्होंने हाथ जोड़ते हुए कहा -'हे माते! मेरे लिए इससे ज्यादा दुर्भाग्य की बात और क्या होगी कि जिसके द्वारा मेरा सृजन हुआ वहीं मुझे चीन्ह ना सकी? हे माते !मैं आपका पुत्र वरुण देव हूँ। उनकी ऐसी दशा देखकर मेरी आँखों से शैले- अश्क़ बह निकले।तथा मेरे क्रोध का ज्वार उमड़ पड़ा।

मैंने गुस्से से फुफकारते हुए कहा-' हे जीवनदाता सारंग! तुम्हारी यह दशा कैसे हुई।

'हे माता! मेरी यह दशा उसके द्वारा हुई है जो खुद को आज़म समझता है।हे माते!उसने अपने स्वार्थ के लिए बड़ी -बड़ी फैक्ट्रियों का निर्माण किया उससे निकलने वाले ज़हरीले कचरे को मेरे लहू में मिलाकर उसने अपने लिए हलाहल की व्यवस्था कर ली है। हे माते! मैं तो धरा पर उसी के निमित्त गया हुआ था किंतु वह अपने ज्ञान और अहंकार की मद में यह भूल बैठा है कि जिस क़ुदरत से उसकी बृद्धि,विकास और विनाश धनित होता है उसकी रक्षा, सुरक्षा और अर्चना करने के बजाय वह खुद के गढ़े हुए बेअर्थ और बेकाम के मंदिर के पाषाणिक बुतों, मजारों और गिरजाघरों की पूजा अर्चना कर तथा प्रकृति की अनदेखी कर प्रतिक्षण खुद के विनाश की तरफ बढ़ रहा है।

'हे माता! मैं आपकी वजह से ये सब सहता रहा किंतु अब मुझसे यह अलम बर्दाश्त नहीं होता है। इसलिए हे माते !मुझे आज्ञा दे। मैं इस दन्भी मानव को नियति से खिलवाड़ करने के बदले ऐसा सजा दूँगा कि वह सनातन काल तक याद रखेगा।'

'हाँ माते!आप आज्ञा दे मैं अभी इसी क्षण पृथ्वी से अपनी संजीवनी सांसो (हवा)को जिसे मानव ने गरल बना दिया है को इसी क्षण खीच लूँगा ताकि खुद के विनाश का बीज बोने वाले अभिमानी मानव को सजा मिल सके।'बहुत देर से चुपचाप अग्नि देव,वरुण देव और प्रकृति (शिव-सती) की बातें सुन रहे पवन देव ने गुस्से से कहा। और मानव द्वारा फैलाये गए प्रदूषण के कारण हुई अपनी दशा को कह सुनाया।

' हे मृत्यु के देवता! मैंने धरती पर जीवन के संवाहक अपने तीनोंं पुत्रों की बात सुनने के बाद; मैंने उनसे कहा-'मेरे पुत्रों आप सब बेफिक्र होकर अपने कर्तव्यों का पालन करो।मैं आप से वादा करती हूँ कि जल्द ही मैं ऐसा सृजन करुँगी जिससे आवाम को उसके किये हुए दुष्कर्मों की सजा के साथ ही साथ उसे यह सीख भी मिलेगी कि बुराई का फल हमेशा बुरा ही होता है जो हमेशा विनाश की ओर ले जाता है किंतु हां ! अगर वह इस सीख (कोरोना) से सीख लेकर भी ना सुधरा तो अगला पड़ाव सम्पूर्ण मानव जाति के विनाश का होगा।यह तुम सब से मेरा वादा है।'कह कर जीवन की देवी नियति तिरोभूत हो गई।


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