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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

प्रबोध कुमार गोविल की पुस्तक
‘‘लेडी ऑन द मून’’ की समीक्षा

समीक्षक - सुधा जौहरी


सुधा जौहरी - आत्मकथा का ये भी एक रंग

लेडी ऑन द मून ! कौन है प्रबोध कुमार गोविल की यह रहस्यमयी लेडी? सदियों से चाँद पर बैठी समय चक्र का प्रतीक चरखे का पहिया घुमा, किरणों का सूत कातकर चाँदनी की चादर बुनती काल्पनिक आकृति या इक्कीस वर्षीय नवयुवक के मन में नभ में खिले चन्द्रमा को देख उभरती किसी ड्रीमगर्ल की छवि, जिसकी याद आते ही भावुक मन गा उठता है- ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’।

खै़र, लेडी ऑन द मून जो भी हो, लेखक की आत्मकथा का यह दूसरा खण्ड पाठकों तक पहुंचना अत्यंत सराहनीय है। सत्य तो यह है कि आत्मकथा लिखना बड़ी टेढ़ीखीर है। दूसरों के जीवन की घटनाओं, उनके खट्टे-मीठे अनुभवों व दूसरों के मनोभावों को समझने की रचनाकार की क्षमता के आधार पर कहानी लिखना, उसमें थोड़ा कल्पना का तड़का लगाना इतना कठिन नहीं है जितना स्वयं के जीवन में झाँक कर छिपा के रक्खी पोटलियों को सबसे सामने खोलना।

प्रायः अपनी असफलताओं का दोष हम दूसरों पर या प्रारब्ध पर डाल देते हैं किन्तु तटस्थता से आत्म-विवेचन कर अपनी ग़लतियों को स्वीकार करना सरल नहीं है।

हमारी भी यात्रा शुरू हो जाती है प्रबोध जी का हमसफ़र बनकर। हर परिस्थिति में सहज महसूस करते लेखक का चुम्बकीय व्यक्तित्व सभी वर्ग के लोगों को उनसे जोड़ता चलता है चाहे वे गाँव के भोले भाले नवयुवक हों, कार्यालय के साथी हों अथवा कान के कीड़े झाड़ने वाली गालियों की शब्दावली प्रयुक्त करने वाले महानुभाव। बहुआयामी प्रतिभा का धनी है यह बैंक में कार्यरत पदाधिकारी। वह जाने कब कहाँ अपनी कहानियों, लेखों व कविताओं का विषय खोज उसे शब्दों में ढाल प्रस्तुत कर देता है।

ऐसा लगता है मानो यायावर सा घूमता यह जिज्ञासु सागर तट पर बिखरी अनगिनत सीपों को खोलता है और हर सीप में उसे बड़ा या छोटा मोती मिल ही जाता है। हम देखते हैं कि लेखक किस प्रकार साहित्य के सोपानों पर चढ़ते हुए शिखर तक पहुँचता है।

सभी विधाओं में लेखक की रचनाओं को पहचान व भरपूर सराहना मिली है, चाहे वे कहानियाँ हों, उपन्यास हों, सम-सामयिक विषयों पर लेख हों, फ़िल्म स्क्रिप्ट हो, लघुकथाएँ हो अथवा बाल साहित्य। मर्मान्तक विषयों पर इतनी संवेदनशील भाषा में ऐसा ही व्यक्ति लिख सकता है जिसने जीवन के प्रत्येक पहलू को अत्यंत निकट से देखा हो, मन की आँखों से उसे महसूस किया हो।

शायद यही वजह रही होगी कि पात्र जीवंत होकर उभरते हैं, चाहे वे अवैध धन्धे वाली अश्लील इशारे करने वाले बेबस वेश्यायें हों अथवा उच्चवर्गीय ऐशोआराम का जीवन जीते सम्पन्न व्यक्ति। और इन सबके साथ ही अपनी कमियों को स्वीकारना !

कितने पुरूष हैं जो अपनी मंगेतर, विवाहोपरान्त पत्नी की प्रतिभा को निष्ठापूर्वक उजागर कर उसे अपने से श्रेष्ठ मानने का साहस करते हैं वरना इस पुरूष प्रधान समाज में कवि-लेखक चाहे प्रेमिका की खूबसूरती पर कसीदे पढ़ें, उसके विरह में तड़पते रहें किन्तु बौद्धिक रूप में स्वयं को उससे हीन समझना बिरलों के ही बस की बात है। किन्तु लेखक की स्पष्टवादिता वास्तव में सराहनीय है।

जीवन के कुछ करूण पक्ष भी मर्मस्पर्शी हैं। पिता की मृत्यु के समय उनके निकट न होने का दुख स्वयं में बहुत कष्टदायक है परन्तु उन तक अपनी भेजी धनराशि न पहुंचने का काँटा जीवनभर की चुभन दे गया है।

इसी प्रकार प्रथम संतान की किलकारी सुनने, उस अबोध के स्पर्श का सुख पाने की लालसा में अस्पताल जाना और वहाँ अपने दो नवजात पुत्रों को खोकर ख़ाली हाथ सूनी गोद लौटने की पीड़ा पाठक सहज ही महसूस करते हैं।

इस बीच हमारा परिचय उन प्रबोध कुमार गोविल से भी होता है जिनकी संवेदनशीलता व मानव मूल्यों के प्रति निष्ठा बिकाऊ नहीं है। न किसी सिफ़ारिश की मोहताज है, जो भी पाना है अपने दम पर।

कदम-कदम पर आपने बेसहारा नवयुवकों की सहायता की है, उन्हें स्वावलम्बी बनाया है, पूर्ण निस्वार्थ भाव से।

मायानगरी में चमकते सितारों व अन्य महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों से आपका निरन्तर सम्पर्क रहा, वह भी एक निर्लिप्त भाव से। फिर भी परिवार सदा सर्वोपरि रहा है।

इस प्रकार दो दशक हम पार कर जाते हैं जो लेखक के ही शब्दों में ‘वर्ष बढ़ते गए, जीवन छोटा होता गया’ का अहसास कराते हैं। सागर की उद्दाम लहरों से दूर हम पहुँच गए हैं शांत कल-कल बहती, संगमरमर की चट्टानों के बीच अठखेलियाँ करती पावन नर्मदा के तट पर।

देखें अब कौनसी पोटली खुलती है, बस प्रतीक्षा है आत्मकथा के तृतीय खण्ड की।

पुस्तकः लेडी ऑन द मून ( आत्मकथा, भाग- 2)
लेखकः प्रबोध कुमार गोविल
प्रकाशकः साहित्यागार जयपुर
संस्करणः 2020 (हार्डबाउण्ड)
मूल्यः 300 रु.
पृष्ठः 176
समीक्षाकारः सुधा जौहरी, जयपुर


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