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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

इस तरह भी ज़ुल्म वो ढाते रहे

अजय प्रसाद

इस तरह भी ज़ुल्म वो ढाते रहे देख कर मुझे बस मुस्कुराते रहे । कर के तौबा,मुझसे मिलने की गली से मेरी वो आते जाते रहे । न इज़हार,न इकरार न सरोकार मगर अपनापन वो जताते रहे । न वादा किया ,न खायी कसम मगर रोज़ मेरे ख्वाबों आते रहे । हम दोनो ही कितने बेवकूफ थे बस यूँ ही दिल को बहलाते रहे ।

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