मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

ज़िंदगी मुझसे ही जुदा क्यूँ है

आस्था दीपाली

ज़िंदगी मुझसे ही जुदा क्यूँ है मेरी खातिर ही हर सज़ा क्यूँ है वक़्त से दूर दूर चलती है ज़िन्दगी तेरी ये अदा क्यूँ है ज़िंदगी मुझसे तू गले तो मिल ऐसी नाराज़गी भला क्यूँ है प्यार से महका है जहां सबका पर मुक़द्दर मेरा बुरा क्यूँ है 'आस्था' करती जब वफ़ा सबसे उसके हिस्से ही फिर जफ़ा क्यूँ है

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें