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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

कोरोना: शिक्षण में चुनौतियाँ

डॉ० रविन्द्र कुमार मारू

परिवर्तन प्रकृति का स्वभाव है और बदलते समय के साथ जो अनुकूलन करता है वही इस दुनिया में जीवित रह सकता है| डब्लू.एच.ओ. द्वारा घोषित इस वैश्विक महामारी (कोविड-19) के दौर में पूरा विश्व जहाँ बढ़ते कोरोना मरीजों की संख्या, सिमित चिकित्सा संसाधनों, आर्थिक मंदी, बेरोजगारी, गरीबी और भुखमरी की समस्या से जूझ रहा है वहीं एक और गम्भीर समस्या देत्यरूप में हम सबके समक्ष आ कर खड़ी हो गई है वह है शिक्षा की समस्या|

भारत के सन्दर्भ में तो यह और भी गम्भीर मुद्दा है जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता| महामारी के चलते राष्ट्र के लाखों नोनिहालों की औपचारिक शिक्षा बुरी तरह से धराशाई हो गई है| देश भर में न केवल अनेक बोर्ड और यूनिवर्सिटीयों की अपितु कई राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाएं भी कोरोना के भंवर में फंस गई है| नाजुक हालात और विषय की गम्भीरता को समझते हुए देश के जिम्मदार लोगों को ठोस कदम उठाने होंगे| फिलहाल देश के सामने शिक्षा सम्बन्धित बहुत सी चुनोतियाँ उभर कर सामने आई है-

1. लॉक-डाउन के अंतर्गत विद्यार्थियों को शिक्षा से जोड़े रखना,
2. देश में बकाया परीक्षाओं को आयोजित करवाना,
3. विद्यालयी शिक्षा व्यवस्था पुनः प्रारम्भ करवाना,
4. विद्यार्थियों की समुचित स्वास्थ्य की सुरक्षा की जवाबदेही आदि प्रमुख हैं|

हालांकि वर्तमान हालातों में केवल नकारात्मक पहलूओं को ही देखना शायद बेमानी होगी| चुनोती भरे इस समय में हमें अनेक दुसरे देशों से भी सीखना चाहिए| कहते हैं, जापान में हुई भीषण तबाही के वक्त वहां के बुद्धिजीवियों ने बचाव शिविरों में ही बच्चों को पढाना प्रारम्भ कर दिया था और इसी कारण वे विश्व के समक्ष शीघ्र ही अपना वर्चस्व पुनः कायम कर सके| हम सब यह जानते ही हैं की जब तक कोरोना का वेक्सीन नहीं आ जाए कमसे कम तब तक तो हमें इसके साथ ही जीने की आदत डालनी होगी ऐसे में बच्चों को जागरूक करते हुवे उन्हें इस वायरस से बचाव और इससे लड़ने के लिए तैयार करना भी हमारी बड़ी जिम्मेदारी है और आज शिक्षा के क्षेत्र में बच्चों की सुचारू शिक्षण व्यवस्था बनाने की जिम्मेदारी शिक्षकों को ही निभानी होगी|

गरीबी वश शिक्षा का अभाव यूँ भी हमारे देश की विकट समस्या है ऐसे में कितने लोगों के पास स्मार्ट फोन होंगे..? फिर भी जिनके पास है उन बच्चों को लॉकडाउन के अंतर्गत विद्यार्थियों को शिक्षा से जोड़े रखने के लिए हमारे विद्वान शिक्षकों को आधुनिक तकनीकों का सहारा लेना आवश्यक हो गया है, ऑडियो, वीडियों, ऑनलाइन क्लासेस और व्हाट्सेप आदि सोशल मीडिया को माध्यम बनाते हुए एक-एक बच्चे से सम्पर्क में रहा जा सकता है| देश में बकाया परीक्षाओं को आयोजित करवाना भी एक बड़ी चुनोती है जिसे ऑनलाइन पेपर पेटर्न से, या फिर विस्तृत गाइडलाइन्स के माध्यम से बची हुई परीक्षाओं को सावधानी पूर्वक करवाया जाना चाहिए| विद्यालयी शिक्षा व्यवस्था पुनः प्रारम्भ करवाना भी एक बड़ी चुनोती वाला कार्य है इसके समाधान के लिए मोटे तौर पर हमें देखना पड़ेगा की हमारे पास किस - किस प्रकार के विद्यार्थी हैं..? इन विद्यार्थियों को उम्र अनुसार पाँच भागों में बांटा जा सकता है जो निम्न प्रकार हैं- पहली श्रेणी में नर्सरी से कक्षा पांच तक, दूसरी श्रेणी में कक्षा छ: से आठ, तीसरी श्रेणी में कक्षा नवीं और दसवीं, चतुर्थ श्रेणी में कक्षा ग्यारह एवं बारहवी, और पंचम श्रेणी में कॉलेज और हायर एज्युकेशन वाले विद्यार्थी| इन पाँचों श्रेणियों को अलग-अलग तरह से सम्भालना होगा यहाँ हम कक्षा ग्यारह से लेकर उच्च शिक्षा के विद्यार्थियों को स्वयं अपना ध्यान रखने के साथ ही साथ अन्य लोगों का ध्यान रखने की जिम्मेदारी सोम्पनी चाहिये ताकि वे इस महामारी के समय अपनी जिम्मेदारी को समझते हुवे समाज और देश के प्रति कर्तव्य का निर्वाह करना भी सीखें, जबकि हमें सबसे अधिक सम्वेदनशील छोटे बच्चों के साथ रहना होगा जो बच्चे नर्सरी से कक्षा पांच में पढ़ रहे हैं, चूँकि वे बच्चे इस बिमारी से जल्दी संक्रमित हो जाते है, उनके मास्क लगाये रखना, बार बार सेनेटाइज करना, डिस्टेंस का पालन करवाना बहुत कठिन है अत: इन विद्यार्थियों को विद्यालय कब से बुलाना है इस बारे में गम्भीरता से फैसला होना चाहिए|

हम जानते हैं कि जितनी सहजता से अपने विचार यहाँ रख रहे हैं उससे कहीं कठिन इन व्यवस्थाओं को लागू करना है और इससे भी अधिक कठिन इस जिम्मेदारी को उठाना है| क्योंकि विविधताओं से भरे भारत में शिक्षा व्यवस्था भी बहुत जटिल है| लेकिन यह सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है न केवल किसी शिक्षक, विद्यालय प्रशासन, अभिभावक, या समाज के प्रबुद्धजनों की अपितु प्रत्येक भारतीय नागरिग को शिक्षा के इस परम पवित्र हवन में अपनी आहुति देनी होगी तब सफलता निश्चय ही प्राप्त होगी|


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