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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

दरकती दीवारें

नीरज कुमार आज़ाद

“मात-पिता गुरु प्रभु के बानी, विनहिं विचार कहिये शुभ जानी।“ अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि माता-पिता और गुरु की आज्ञा सदैव हितकारी होती है, वे जो कुछ भी बोलते हैं उसमें हमारी भलाई के बीज छुपे होते हैं। इसीलिए शास्त्रों में भी इन तीनों को देवता तुल्य माना ये तीनों ऐसे मजबूत प्राचीर (दीवार) के समान हैं जिनके अंदर रहकर हम अपने-आपको महफूज अनुभव करते हैं। पिता जो की हमें बाहरी आबोहवा के बुराइयों से बचाने के लिए मजबूत रक्षा कवच की भांति खड़े रहते हैं,तो माता हमारे अंदर की सूखती हुई भावनाओं को अपने उमड़ती हुई ममता के सागर से सिंचित करती हैं। वहीं गुरु, मानव का सबसे बड़ा शत्रु अज्ञानता से मानव को ज्ञान रूपी प्रकाश की दीवार से रक्षा करते हुए एक सफल मानव बनने की राह तक लाते हैं। परन्तु आधुनिकता और भौतिकता के ज्वार-भाटा ने इनकी जड़ें हिला कर रख दिया है। आजकल जब भी समाचार पत्रों के पन्नों को पलटते हैं तो निश्चय ही प्रत्येक दिन एक ऐसी खबर पढ़ने को मिलता है, जिससे शरीर के रोम-रोम काँप उठता है। जरा सोचें जिसने अपनी सुंदरता का ख्याल न करते हुए अपने बच्चे को गर्भ में नौ माह तक अपनी खून से सींचा हो, अपने सीने से लगाकर स्तन पान कराया हो। जिन्होंने ऊँगली पकड़कर आँगन में चलना सिखाया। जिनकी लोरियों से आनन्दित होकर नींद का सुख प्राप्त किया हो। सो जाने पर जिन्होंने मक्खी,मच्छर से बचाने के लिए अपनी परवाह न करते हुए अपनी स्नेहिल आँचल से ढँककर रक्षा की हो। जिन्होंने अपनी हाथों से खाने का निवाला मुँह में रखा हो। जिसने अपनी दोनों हाथों से आशीर्वाद का सागर न्योछावर कर दिया हो । आज उन्हीं हाथों को पकड़कर घर की देहलीज से बाहर घसीटा जा रहा है। उन्हें यातनाएं दी जा रही है। घर की एक कोठरी में बंद कर खाने-पीने को तरसाया जा रहा है। “बेटे बहू चपाती खाये और माँ सूखी रोटी को ललचाय।“ बाह रे कलेजे का टुकड़ा। रूहें तो तब और काँप जाती है जब उनकी ममता और उपकारों का बदला उनके केशों को पकड़कर घसीटते हुए चिलचिलाती धूप में किसी सुनसान सड़कों पर फेंक कर लिया जा रहा है। वे अपने कलेजे के टुकड़ा से रो रोकर, पावँ पड़ते हुए घर के एक कोना में एक रोटी की भीख माँगती है और बदले में उनके लिए बृद्धाश्रम का दरवाजा खोल दिया जाता है। यह भी तब जब उनकी आँखों को बेटा रूपी चश्मा, हांथों को बुढ़ापे की लाठी और उनकी सूखती ममता को बेटे का प्यार चाहिए। पर लाचार बूढ़ी माँ के पास यमराज को निमंत्रण देने के सिवा और कोई रास्ता भी न बचता। कुछ दिनों बाद बृद्धाश्रम की सीढ़ियों पर अंतिम सांस गिनती हुई लावारिश लाश की तरह एरो-गैरों हाथों से श्मशान की यात्रा करती है। यही माता की ममता का पुरस्कार है और जीवन का दुखद अंत भी।

वर्तमान समय में आधुनिकता और भौतिकता की ठोकरों ने पुत्र और पिता के बीच बनी स्नेह सेतुबंध को हिलाकर रख दिया है। पिता का हाल भी माता से अच्छी नहीं है। आए दिन घर में बच्चे अपने पिताजी के पास बैठकर सही से बात भी नहीं कर पाते। उन्हें तो अपनी सुघड़ पत्नी के प्रेम मंत्र ने माता-पिता के ममता को कमजोर कर दिया है। ज्यादा कुछ होने पर अब तो पिता के पीठ पर लाठियों की बौछार होने लगती है। गालियां सुननी पड़ती है,और यहाँ तक कि उनकी बेरहमी से हत्या भी कर दी जा रही है। मैं कुछ दिन पहले समाचार पत्रों में पढ़ा था कि बेटे के मनपसंद की शादी न होने पर उसने अपने पिता को हीं कुदाल से काटकर निर्मम हत्या कर दी। उस बक्त मेरी आँखों में आंसू छलक आए क्योंकि मैं भी एक बेटा हूँ और क्यों नहीं यह कलंक भी तो बेटे के सर लगा है? मैं यह भी मानता हूँ कि सभी बेटे ऐसा नहीं है पर उनकी संख्याये अधिक हैं। आप प्रायः ज्यादातर घरों में देखें होंगे या फिर अनुभव किये होंगे की छोटी-छोटी बातों को लेकर बच्चे माता-पिता से नाराज़ हो जाते हैं। उनके पास बैठना तो दूर बात करना भी छोड़ देते हैं। अगर उनकी तबियत खराब हो जाये तो उन्हें शायद दवा लेने के लिए पड़ोस के घरों पर निर्भर रहना होगा। उन्हें लगता होगा कि अपने ही घरों में बेटे की कटुता का विषपान कर रहे हैं। उन्हें ऐसा एहसास हो रहा होता है जैसे अपनों ने उन्हें बेकार कचरा समझकर घर के एक कोने में रख दिया हो। वे शायद सोचते रहते होंगे कि जिसे मैं आँखों का तारा समझता हूँ शायद आज मैं उनकी आँखों का कांटा बन गया हूँ।अब बची-खुची जिंदगी अश्रु के सागर में ही बहाना होगा। “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पायँ। बलिहारी गुरू अपने गोविंद दियो बताय।।“शायद यह श्लोक वर्तमान समय में उपेक्षा की कड़वी घूंट लिए फिर रहा है।जहाँ गुरु द्रोणाचार्य, गुरु वशिष्ठ, गुरु विश्वामित्र जिनके चरणों को स्वयं भगवान भी स्पर्श करने में आनन्द का अनुभव करते थे। आज वही चरण अपनी पहचान ढूंढने में भटक रही है। वे असमाजिक, असांस्कृतिक बाणों से घायल पड़ा है। जिसकी पहचान करना असंभव तो नहीं पर मुश्किल जरूर है। “गुरू बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष। गुरु बिन लखै न सत्य को गुरु बिन मिटै न दोष।।“ परंतु वर्तमान समय में गुरु राजनीतिक शतरंज का मोहरा मात्र बनकर रह गया है। जिसकी डोर पकड़कर कई लोगों ने राजनीति के शिखर विंदु को छुआ है। आज लोगों ने गुरू को स्वार्थलोलुप्ता के रथ पर बैठाकर अपमानों के कठोर बाणों से छलनी-छलनी करने पर उतारू हो गया है। सरकार की ढुलमुल नीतियों ने उन्हें भुखमरी के गहरी सागर में डुबो दिया है। उनके अंदर से निकलनेवाली ज्ञानपुँज को समस्या के आवरण ने ढँक लिया है। अब तो उनकी नैया राजनीतिक पार्टियों के वादों के भंवरजाल में फंसता चला जा रहा है। अलग-अलग पार्टी अपनी सुविधानुसार पतवार से शिक्षा की नैया को दिशा देने में लगा है। कोई पार्टी पूर्ण वेतनमान तो कोई पुरानी पेंशन देने की घोषणा करके भोलीभाली शिक्षक के साथ ठीक वैसे ही छलावा करता जा रहा है जैसे घनघोर घटायें किसी रेगिस्तान में बाढ़ लाने का वादा कर रहा हो। यह विडंबना ही है कि जो दूसरों को दिशा दिखाकर उसे सत्यमार्ग पर चलना सिखाता हो आज वो खुद ही दिशाहीन हो के समस्या के जंगल में भटकने पर मज़बूर है। शिक्षक आये दिन विद्यालय में दुर्व्यवहारों की कड़बी घूंट पीने पर मज़बूर है। जिसे नहीं कहना चाहिये वो भी उनको सार्वजनिक संपत्ति मानकर अपमान का दो घूंट रस पिलायें बिना सुकून न पता। ऊपर से लाल फ़ित शाही और नीचे से ग्रामीण जनता अपने घर या ऑफिस के गूस्सों का गुब्बारा उनके माथे पर ही फोड़ता। बेचारे इन अपमानों को सहन करने के बजाय और कर ही क्या सकते। उनकी सुनने वाला तो कानों में ठेपी डालकर ग्रामीणों के साथ मुर्गा, भात और व्हिस्की की बोतलें तोड़ने में मशगूल रहते हैं। उनके अपमानों का घाव और ताजा तब हो जाता है, जब अपने ही पारिश्रमिक लेने के लिए उन्हें दफ़्तरों में जाकर कुछ चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है। तब जाकर लम्बे समय से लंबित वेतनादि उनके खाते में पहुंचता है। वर्तमान समय में शिक्षकों की स्तिथि काफी अच्छी नहीं कही जा सकती है। उन्हें न तो समाज में प्रतिष्ठा दिया जाता है और न ही वरीय अधिकारियों से समय पर सहयोग। नतीजतन शिक्षक समुदाय असंतोष के सागर में गोता लगाने पर मजबूर हैं और अगर आनेवाले भविष्य में यही स्थिति बरकरार रहा तो हमारा राष्ट्र विकासशील से विकसित की ओर तो अग्रसर होगा परन्तु हम बसुधैव कुटुम्बकम के नारे को मृतप्राय अवस्था में पाएंगे। क्योंकि हमारे अंदर संस्कार का बृक्ष इन्हीं तीनों दीवारों से महफ़ूज़ रहता है। ये तीनों दरकती दिवारें(माता,पिता और गुरु) चीख-चीख कर कह रहे हैं की मुझे कोई तो गिरने से बचा लो। मेरा क्या कसूर है? अगर मैं गिर गया तो संस्कारों का बृक्ष भी सुख जाएगा। अगर हम इन्हीं की उपेक्षा करेंगे तो निसन्देह संस्कारों के वृक्ष की जड़ों में दीमक तो लगेगा ही साथ ही साथ हम अपने माता-पिता और गुरू के प्रेम से भी बंचित रह जाएंगे। इससे पहले की संस्कार के बृक्ष सूखे हमे इन दरकती दीवारों पर अपनी भावनाओं, प्रेम और बंधुता का लेप लगाकर इनकी दर्द को कम करने का प्रयास करना चाहिए। आज यह समस्या किसी एक घर की नहीं, बल्कि कमोबेश लगभग सभी घरों की है। बदलते हालात इस प्रश्न को मानव जाति के सामने चीख-चीख कर पूछ रहा है कि क्या पुत्र का कर्तव्य अपने माता-पिता की उपेक्षा करने मात्र रह गया है? क्या उनकी यह जबावदेही नहीं कि उन्हें आदर स्वरूप सम्मान दे और इनकी भावनाओं को संजोये रखें? क्या शिष्य का कर्तव्य गुरुजनों को अनादर करना मात्र रह गया? क्या समाज का यह उत्तरदायित्व नहीं की इनकी गरिमा, इनकी भावनाओं को उचित सम्मान दें? इन्हें समाज में वही आदर प्राप्त हो जो प्राचीन गुरुओं को प्राप्त था। और अगर हमलोग ये सब नहीं दे सकते तो जरा सोचिये कि अगर इनकी अवशेषों पर अज्ञानता का बसेरा हो जाय तो हम कितने कदम आगे चल पाएंगे? इसलिए आइये हमसब मिलकर माता-पिता और गुरु रुपी मजबूत स्तम्भ को दरकने से बचायें और इन्हें सुरक्षित रखने का प्रयास करें। ताकि हमसबों को इनके प्रकाश से मार्गदर्शन मिलता रहे। एक कदम आपका आपके घर के लिए।


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