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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

लॉक डाउन

चन्द्रकान्ता अग्निहोत्री

हर बार लॉक डाउन खतम होने की तारीख पास आती तो मन में आशा सी बंध जाती कि रुके हुए काम पूरे हो सकेंगे। सबसे पहले वह ऐनक ठीक करवाएगी । इसके टूट जाने से सारा काम रुक गया था। सबसे छोटे पोते ने खेल खेल में कब तोड़ दी पता ही नहीं चला। न जाने कब समय मिलेगा उसे अपनी ऐनक ठीक करवाने का ।इसी तरह वह सोचती रही और अचानक कर्फ्यू लग गया और अगले दिन लॉक डाउन शुरू हो गया ।उसके पास बाई फोकल ऐनक भी थी लेकिन उस से काम चलाना थोड़ा कठिन हो रहा था । अब जब लॉक डाउन को कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित रखा तो उसने सोचा कि सबसे पहले वह अपनी ऐनक ठीक करवा ही ले ।.....सोचा बेटा तो रात को घर आता है। बहू को ही कह दूं।।उसकी बहू नीता प्राध्यापिका है । विवाह के बाद बेटा अलग फर्स्ट फ्लोर पर रहता है ।.....बच्चे स्कूल से आने के बाद या छुट्टी वाले दिन उसके पास ही रहते है ।

कॉलेज से वापसी मे नीता कई काम निपटा लेती है।फिर भी किसी जरूरी काम के लिए उसे मार्केट जाना ही पड़ता है ।वैसे भी ऐनक की दुकान दूर नहीं थी।

शीला ने नीता से कहा कि जब उसके पास समय हो तो उसे मार्केट ले जाना। वह मान गई।

अगले दिन जब वह कॉलेज से आई तो शीला ने उसे कहा", आज चलें?"

नीता ने कहा", अभी तो नहीं शाम को चलेंगे।

"....... ठीक है।"

4:00 बजे के लगभग वह आ गई। शीला तो तैयार ही बैठी थी। उसके दोनों पोते इतने बड़े भी नहीं थे कि घर में अकेले बैठ जाते ।उसने बच्चों को भी साथ चलने के लिए कहा ।बड़ा बैठ गया पर छोटा पोता अभी बाहर ही खड़ा था।

‘........ चलो बैठो जल्दी करो।’ कह कर बड़े पोते अगम को भीतर बिठाया। अखिल को बिठाने के लिए जैसे ही पीछे मुड़ी तभी अगम ने कार का दरवाजा बंद कर दिया ।उसका हाथ दरवाजे के ऊपर था परिणाम..... एक उंगली पर थोड़ी सी चोट लगी थी।वह बहुत जोर से चिल्लाई ,और वह भी।पर चोट तो लगी थी ।शीला ने पूछा ,"कहां लगी है।" तो उसने उसका हाथ झटक दिया और धक्के से छोटे पोते को घसीट कर कार में पटक दिया और अगम केबाल खींच कर उसकी छाती पर जोर से लात मारी।

यह देख कर शीला बहुत घबरा गई उसे समझ नहीं आया कि वह क्या करें? वह खड़ी रही फिर 'चलो ' सुनकर वह चुपचाप कार में बैठ गई ।अगर वह कुछ बोलती तो हो सकता था कि वह उसे भी कुछ सुना देती ।......कालोनी में और तमाशा बनता।..... वह असमंजस में ही थी। मन में आया कि मना कर दे। कैसे ले जाएगी? दर्द तो हो ही रह होगा ।लेकिन उसने झटके से गाड़ी चला दी ।इतनी तेजी से गाड़ी चलाते देख उसे घबराहट होने लगी ।लेकिन वह कुछ नहीं बोली। उसने न जाने गाड़ी को कहां-कहां घुमा दिया ।फिर वह ऐनक की दुकान पर पहुंची ।शीला ने जल्दी से अपनी ऐनक ठीक करवाई और जब वापस गाड़ी में आकर बैठने लगी ।तो देखा वह फोन पर किसी से बात कर रही थी जरूर उसके बेटे अरुण से कर रही होगी पर वह चुपचाप गाड़ी में आकर बैठ गई ।वापस आने में केवल दस मिनट लगे ।जबकि जाने में आधा घंटा लग गया था। घर आकर उसने चैन की सांस ली ।तभी उसने देखा कि कार बंद कर नीता उसके पीछे पीछे भीतर आ गई।फिर उसने देखा बेटा भी पीछे - पीछे आ रहा है ।नीता ने ही बुलाया होगा ।नीता बोली....

"..…एक बात कहनी है ।.आपकी बेटी को चोट लगी होती तो क्या आप उसे लेकर जाते?"

....... तुमने तो ऐसी हालत कर दी थी कि न वापिस जाने योग्य थी न बैठने योग्य ।असमंजस मे थी कि क्या करूं?

"... आपने तो मुझे कॉलेज से आते ही चलने के लिए कह दिया जैसे मैं वहां डांस करके आई थी ।

यह बात, यह घटना उसके लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं थी वह यह सुनकर हतप्रभ रह गई ।आज उसे क्रोध आ गया ।उसकी ऐसी कितनी ही हरकतों को सहन किया और कभी कुछ नहीं बोली थी।

"...... तुम तो मुझ पर पूरा अधिकार समझती हो ,मैं चाहे ठीक हूं या नहीं। इस उम्र में भी बच्चों का पूरा ध्यान रखती हूं।..... कोई एहसान नहीं करती क्योंकि ये मेरे अपने बच्चे हैं।......फिर भी थक तो मैं भी जाती हूं ।क्योंकि निश्चित समय पर किसी काम को करने में कठिनाई होती है ।लेकिन मैंने कभी कुछ नहीं कहा और तुम तो मुझे यहां तक लेकर गई हो वह भी इसलिये कि मुझे कार चलानी नहीं आती ।और ऐनक बनवानी बहुत जरूरी थी । तुम्हें खुद कहना चाहिये था ठीक करवाने के लिए। तभी बेटा बोला........

"......अच्छा अब चुप हो जाओ ।"

..."....हद हो गई इस तरह तो कोई नौकर से भी बात नहीं करता ।नीता !न तुम्हें उम्र का लिहाज है न रिश्ते का।

यह लॉक डाउन न होता तो मैं इसे अपने आप ठीक करवा लेती तुम्हें कहना ही न पड़ता ।

...बेटी की बात करती हो ।पहली बात वह इस तरह का व्यवहार न करती जिस तरह तुमने अपने बच्चों के साथ व मेरे साथ किया है ।वह कह देती कि फिर कभी चलेंगे लेकिन तुमने तो मुझे सोचने का अवसर ही नहीं दिया"।

..'.....नीता तुम जाओ ।'बेटा बोला।

'.....…अच्छा जाता हूं मैं भी '।

वाह बेटा !तुमसे एक बार भी नहीं कहा गया कि मां के साथ कैसे बोल रही हो एक तो उसका स्वभाव ऐसा, दूसरा लॉक डाउन ने चिड़चिड़ा बना दिया है शायद।उसने मन ही मन सोचा।यह लॉक डाउन तो अब हुआ पर रिश्तों का लॉक डाउन न जाने कब से शुरू हो चुका था

........जाते जाते फिर बोल रही थी। "मैं जानती हूं सब ।आपको अपने काम की पड़ी रहती है । "कहकर वह सीढ़ियां चढ़ गई। उसकी पद चाप उसे किसी हथौड़े से कम नहीं लग रही थी । अपनी बेबसी पर वह रो पड़ी।


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