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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

क्षणिकाएं

विभा रश्मि

1. माँ लोरी गाती है झूले में कभी काँधे पे थपकियां देकर सुलाती है । 2. माँ समझाती है दुनियादारी ऊँच -नीच और लोलुप लोगों और उनकी नज़रों से बचना । 3. माँ दोस्ती निभाती मन की सुनती अपनी कभी न कहती सखी वो प्यारी साथ सदा‌ निभाती । 4. माँ सही - ग़लत की पहचान करना सिखाती , मतभेद और मनभेदों के हल सुझाती और सुलझाती ‌- अनसुलझी उलझनों की कड़ियां ।

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