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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

पता नहीं क्यों .....

वीरेन्द्र कौशल

पता नहीं क्यों ज़िन्दगी से नफ़रत सी हो गई छोटे रहे तो सब अपने रहे अब हकीकत भी लग सपने रहे हर चीज़ जैसे बर्फ़रत हो गई पता नहीं क्यों ...... पथरीले से सब गांव रहे हमें ढ़क कर भी नंगें पांव रहे भावना ज़िन्दा दिल रहते ही मृत हो गई पता नहीं क्यों .... हमारे खातिर सदा पीपल सी छांव रहे भले आधी धूप व छिले पांव रहे क्यों हालात-ए-ज़िन्दगी धृणारत हो गई पता नहीं क्यों ....... हर कोई अपने फायदे खातिर निज स्वार्थ और कायदे खातिर ज़िन्दगी क्यों विषैले अमृत सी हो गई पता नहीं क्यों .... सब से अपनों सा साथ रहा जब तक बुज़ुर्गों का सिर पर हाथ रहा पर छालना तो अब फितरत हो गई पता नहीं क्यों ... कोई स्थाई समाधान हमें ही ढूंढ़ना होगा सर्वजन हिताय का मूल मंत्र ही फूंकना होगा न लगे धरा कतई विकृत हो गई पता नहीं क्यों ....


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