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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

चल रे श्रमिक गाँव की ओर

विनीता तिवारी

बहुत हो चुका शहरों का रूख छोड़ देखना ग़ैरों का मुख गाँव की मिट्टी की ख़ुशबू से बँधी है मन की डोर बीते पल बरगद के नीचे हाथ पकड़ घर वापस खींचें उन बिसरि यादों की सरगम भुला न दें ये शोर खेत खड़े राहों को तकते थकी बींदणी सजते सजते पूछ रही पगडंडी से कब आएँगें चितचोर चल रे श्रमिक गाँव की ओर


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