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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

होगी मुक्ति इस व्याधि से कैसे...

सुशील यादव

हम कोलाहल में जीने वाले , शांति - पथ में भटक गए हैं..... नफरत के बीज कभी उगा के रोपा करते जो खेतों खंजर वो धरती उनको ही देती आम - जन को घोषित बंजर पर आसमान छलांग लगाते वहीं त्रिशंकु लटक गए हैं । हमने भी जीना सीखा था बिना भेदभाव कुल मर्यादा वो फूट डालने पर आमादा हक मांगते हरदम ज्यादा धीरे - धीरे हर बोलचाल में वे अपनी शैली पटक गए हैं । हर चेहरा बेबस लाचार यहां मातम में डूबा त्यौहार यहां कल तक दौड़ा करता जीवन आज व्यस्त उपचार यहां होगी मुक्ति इस व्याधि से कैसे माथा संशय में चटक गए हैं।

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