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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

गाँव लौटते मजदूर

शैलेश शुक्ला

छोड़ कर अपना गाँव आए सवार सपनों की नाव आए। चूर हुए अब सब सपने लौट चले हैं घर अपने। शहर सभी बनाते ये फिर भी छत न पाते ये। बरसों-बरस श्रम किया लगाकर पूरा दम किया। खूंटी पर इच्छाएँ टांगी थीं बस रोटी-छत ही माँगी थी। वो भी शहर ने दिया नहीं अपनों सा कुछ किया नहीं। जब मजबूरी थी भारी और चारों ओर लाचारी। तब मालिक ने छोड़ा साथ न लगा कुछ उनके हाथ। भूख से बच्चे रोते रहे हर उम्मीद ये खोटे रहे। सोचा है ये थक हार-कर अपने मन को मार-कर। अब गाँव अपने जाएंगे लौट कर शहर न आएँगे।

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