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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

प्रथम पहचान

समितिंजय शुक्ल

पहचान का मुखौटा भले दिखाई नहीं देता मगर जिस चेहरे पे है चढ़ता उस सिर पे है राज करता बहुत खामोशी से काम करता है अपना ही विस्तार करता है रंग रूप मजहब बोली भाषा गावं देश – प्रदेश धरा विचाराधारा असंख्य रूपों में बटा सनातन संघर्ष कर रहा ॥ छोटे – छोटे विवादों से लेकर महायुद्धों तक में इसका हाथ है हर पल हर गली हर शहर हर घर में हर ज़हन हर मस्तिष्क में कर रहा खुराफात है। ये मुखौटे चेहरों पर नहीं ज़हन में पहने जाते हैं साथ में इनके चश्में भी आते हैं एक जात वालों को एक सच दिखाते हैं हर एक को यूं ही लड़ाते हैं नकली पहचान देकर असली पहचान खा जाते हैं। इन सबके बीच एक और मुखौटा जीता है प्रथम पहचान जिसका नाम मिलता है इसकी कोई एक पहचान कोई एक खासियत नहीं पर हर किसी में घुलने की हैसियत वाला यही सारी पहचानों को ये एक साथ अपना सकता है सबको एक साथ दुत्कार सकता है हर इक की खुशी में खुश हर इक की गमीं में दुख और हर शय से आनंद उठा सकता है। इसे पाने के लिये सभी मुखौटे उतारने होते हैं या यूं कहें कि कोई भी नहीं पहनना होता ये जन्मजात होता है जो बाद में म्लान होता है इसी खोए हुए को पाने के लिये कोई वेटिकन, कोई काशी तो कोई क़ाबा तक घूम आता है फिर भी उसमें कोई ना कोई रंग चढ़ा आता है प्रथम पहचान को आखिरी बनाना चाहता है॥


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