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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

मेरे हमसफ़र देना साथ तुम

रेखा पारंगी

टूटने लगूँ, जीवन की डगर पर जब, जोड़ कर एक सार कर देना तुम। विपदाओं से हार कर थक जाऊ जब, हौंसला बनकर हिम्मत देना तुम। भटक जाऊ दुर्गम राहों में जब , पथिक बनकर राह देना तुम। बिखर जाऊ रो-रोकर जब, समेट कर बाहों में भर देना तुम। रात -रातभर सो ना पाऊं जब, सपना बनकर नींदों में आ जाना तुम। खो जाऊ अश्कों के समन्दर में जब, मोती बनकर माला में पिरो देना तुम। जीवन के संघर्ष में झुलसने लगू जब, पेड़ बनकर शीतल छांव देना तुम। मुरझाने लगे जीवन की बगिया जब, होंठों की मुस्कान बनकर खिलखिलाना तुम। चांदनी रातों में तन्हा पाऊं खुद को जब, चांद बनकर तन्हाई बन जाना तुम। लिखने बैठूं गीत , ग़ज़ल, कविता कोई जब, कागज ,कलम ,दवात हाथ थमा देना तुम। बक बक करके दुखने लगे सिर मेरा जब, अमृतांजन बनकर माथे पर राहत देना तुम। रुठ कर हो जाऊ दूर कभी जब, चूमकर माथे पर प्यार,स्नेह देना तुम। मिलने को हो आतुर मन जब , लम्बी छुट्टी लेकर दौड़े चले आ जाना तुम। प्यारे बिट्टू को हो खेलने का मन जब, खुद बच्चा बनकर संग खेल देना तुम। घोलने लगे रिश्तों में कड़वाहट कोई जब, मिठास बनकर जीवन को अमृत बना देना तुम। उभरने लगे यादों के पन्ने जब, ख्यालात बनकर अल्फाज़ बन जाना तुम। खलने लगे कमी मुझको मेरे यारों की जब, दोस्त बनकर वफादारी निभाना तुम। मर्यादाओं को मेरी पार करने लगे कोई जब, रक्षक बनकर रक्षा कर देना तुम। हृदय को रिक्तियां महसूस होने लगे जब, अपने भीतर पूर्णता का अहसास करा देना तुम। मेरे हमसफ़र, जीवन के हर सफर में साथ चलना तुम। मेरी उम्मीदों पर खरा उतरना तुम। आखिरी सांस तक साथ देना तुम।।


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