मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

मैं मुक्त मानवी

रेखा पारंगी

चाहो तो जड़ देना ताले, दुनिया भर की किताबों पर, लेकिन नहीं बना पाओगे ऐसी कोई दीवार, जो पहरे बैठा दे मुझ पर हजार, मैं कोई परिंदा नहीं, जिसके लिए बनाए जा सके पिंजरे और जाल, मैं मुक्त मानवी! उड़ती इच्छा के पैरों पर। रूकूंगी नहीं, झुकूंगी नहीं, कलम मेरी चलती अपने दम पर, लाख छिपा लो मुझको किसी तहखाने में, रोक न‌ पाओगे कोशिशें मेरी लाख कटारों से, नहीं है कोई बंधन ऐसा, जिसको तोड़ा ना जा सके, मेरे अल्फाजों से, क्योंकि मैं मुक्त मानवी! उड़ती इच्छा के पैरों पर।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें