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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

मां

रेखा पारंगी

हर चेहरे में तुमको ढूंढा, स्नेह, प्यार, त्याग में तुमको पाया, अपनों के दर्द में पिघली तुम। उनके हर राह की हमसफ़र तुम, जीवन के पतझड़ में बहार सी तुम, बदलती दुनिया में विश्वास सी तुम, रुतआए रूत जाए,पर हरदौर में एक सी तुम। ख्यालों के पन्नों पर तुमसे जुड़े, न जाने कितने अहसास डूबते उतरते, पर शब्दों में क्यों नहीं बंधती तुम। न कभी देखा न कभी जाना तुमसा, मेरी नज़र से देखोगी तो जानोगी, ईश्वर का रुप हो तुम।


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