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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

मैं आंख हूँ

राम निवास मीना

सभी इंद्रियों में अग्रगण्य, कोरोना काल की साक्षात दर्शक, स्नेह- दृष्टि का प्रतीक……. मैं आंख हूं। चेहरे पर मास्क लगाकर….. नाक से छीना जा सकता है…… सूंघने का हक, कानों को भी ढ़का जा सकता है…. और मास्क की डोरियों से… खूब तंग किया जा सकता है। जीभ तो पहले ही शत्रुओं (दांतों) से…. घिरी रहती है, अनवरत…… कभी कभार मौका पाकर… निकल पाती थी, मुख-विवर से…. लेकिन, अब लॉकडाउन की मर्यादा में…. मर्यादित हो, ज़बान से कटकर…. जीवन काट रही है। ऐसे में स्पृशेन्द्रिय का तो, संसार ही उजड़ गया…….., करें क्या? बेचारी! सोशल डिस्टेंसिग ने तो, उसकी….. अनुभूतियों का वध ही कर दिया। किसी जमाने में कुकर्म.... करने वाले को ही…., काला मुंह करके…. पहचान छिपाकर ,गधे पर बिठाकर…… समाज से बहिष्कृत कर…… सोशल डिस्टेंसिंग के जरिए, न्याय का पाठ पढ़ाया जाता था। मैंने वह सब कुछ देखा…... आखिर….. मैं आंख हूं। अभी भी निरंतर देख रही हूं….,.कि… क्या होगा? उन महिलाओं के होंठों के सौंदर्य का, क्या होगा? लिपिस्टिक कारोबारियों का…. मानो वे सभी कामकाजी स्त्रियां तो…… अपने होंठों की लाली से सदा के लिए….. हाथ धोकर…… उस सौंदर्य बोझ को…. आई लाइनर व काज़ल के रूप में…… मुझ पर ही लेपने के लिए, आतुर हैं…., निरंतर……….। मैं फिलहाल, सौंदर्य बोझ के डर से… सहमी सी, बोझिल और कातर-दृष्टि हूं। किंतु मैं वही आंख हूं…...जो…. हमेशा से सृष्टि चक्र को, वास्तविक रूप में निहारती आई हूं। अब तो मेरी ज़िम्मेदारी…… दिन दुगनी और रात चौगुनी, बढ़ रही है। कोरोना कहर में…… लोगों के हावभाव तक… महसूस कर, स्नेह- रंजित जवाब देना…..,मेरा परम कर्तव्य है। कोविड-19 का मंजर…… मैं बखूबी देख रही हूं, यह प्रकृति का मानव जाति को… अनुपम संदेश है कि बढ़ते हुए…. वैश्वीकरण के युग में…… मानव, मानव का नहीं रहा……… तभी तो मास्क से चेहरा छिपाकर, सोशल डिस्टेंसिंग निभा रहा…..। 'आंखों में इज्ज़त होनी चाहिए' सुना होगा……….आप सभी ने, किसी से चरित्र प्रमाण-पत्र लेने की जरूरत नहीं है मुझे…….. हर दौर में सब पर भारी, सदाचारी…….. और त्रिकालदर्शी….. मैं आंख हूं।।


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