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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

गर्मी की चुङैल

रामदयाल रोहज

विशाल दानव देह तीखे लम्बे लू के नाखुन खुले लम्बे लम्बे बाल खून से सने हुए होठ गर्मी की चुङेल घूम रही है चारों तरफ अपना तांडव मचाती सम्पूर्ण जलाशयों को पीकर फेंक रही है भयंकर आग अपने भोंडे मुख से धोबे भर भर कर पी रही है जीवों जन्तुओं का रक्त हारे सिपाही दरखत सह रहे है चुपचाप भीषण प्रहार छाया सिकुङकर चली गई है होशियार तनों की छाया में भयभीत लोग छुप गये है दरवाजे उढकाकर घर घर में बैठा लिए है कूलर तांत्रिक मंत्रों से हो रहे है बचाव के उपाय लगातार किया जा रहा है अभिमंत्रित जल का छिङकाव


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