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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

क्षितिज

राजीव डोगरा 'विमल'

जीवन क्षितिज के अंत में मिलूंगा फिर से तुमको, देखना तुम मैं कितना बदल सा गया हूं मिलकर तुमको। जीवन क्षितिज के अंतिम छोर में देखना मेरे ढलते जीवन की परछाई को, कितनी बिखर सी गई है मिलकर तुमको। जीवन क्षितिज के अंत में देखना मेरी डगमगाती सांसों को, कितना टूट सी गई है मिलकर तुमको।


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