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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

मासिक धर्म

प्रकाश कुमार खोवाल

हर महीने मासिक धर्म के वो पांच दिन, जब औरत के जिस्म से रिसता है खून सहन करती है वह अपने इस दर्द को, छुपाती है पेट में होने वाली ऐंठन को मगर कैसे सहन करे उस प्रताड़ना को, जो हम - सब मिलकर उसे देते हैं, कहते हैं अपवित्र उस लड़की को, जो प्राकृतिक है उसके जिस्म का, जो प्रतीक है नवसृजनता का, जो गवाह है उसके संपूर्ण होने का इसी से होती है नव जीवन की शुरुआत, तो फिर क्यों इसे घृणा की निगाहों से देखें क्यों उन दिनों घर के कोने में चटाई पर रखें, इसे मंदिर, रसोई में जाने से रोकें क्या उन दिनों उसे जिंदगी जीना मना है, कोई कहता दोष है कोई कहता पाप यदि यह गुनाह, दोष या होता पाप, तो क्यों तुम्हें बनाती किसी बच्चे का बाप मत कहो यह गलत है , क्योंकि यही तो नवजीवन की शुरुआत है क्योंकि तुम्हारा जीवन भी, किसी ना किसी औरत के मासिक धर्म की देन है ना जाने क्यों आज भी इस दौरान, लड़कियों को अशुद्ध समझा जाता है किस-किसको बताएं यह प्राकृतिक चक्र है, जो हर महिला की जिंदगी के लिए आवश्यक है वो लड़की मासिक धर्म के समय भी उतनी ही पवित्र है, जितनी बाकी दिनों में पवित्र होती है सोच बदलो तो शायद दुनिया भी बदले


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