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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

विद्यालय: बचपन से मंजिल तक

डॉ० पूनम गुप्ता

माँ की गोद से दूर निकल कर नए संसार का ' बच्चा ' जब बनता हिस्सा न जाने कितने उतार और चढाव में जोड़ लेता एक अनोखा रिश्ता विद्यालय में पुस्तक और अध्यापक वृंद होते उसके भाग्य विधाता कक्षा उसकी होती कल्पना की सुन्दर और नई अनोखी कार्यशाला अठखेलियो से निकल बस्ते के बोझ को लिए जब विद्यालय वह पहुँचा प्रारम्भ हुई कोरी स्लेट पर लिखने की जीवन में पहली वर्णमाला परम्परा, संस्कार और आदर्शों का पाठ सीखने आता है जब बच्चा पोथियाँ देती ज्ञान -विज्ञान और पाठ पढाती नए जीवन की परिभाषा सीख - सीखा कर निकल पड़े छोड़ अब बचपन की खुशबू से वास्तविकता छूट गई वह मान - मनौव्वल और अब है परिवर्तन की अभिलाषा समझौता सिर्फ समझौता बन जब जाता जीवन जीने का एक हिस्सा दस्तक देता ज्ञान-चक्षु में नित परिवर्तन की विरल विचारधारा बच्चों के भविष्य को संवारने में मिल जाए प्रकृति का जब एक मात्र सहारा जीवन का प्रारम्भ और प्रारब्ध जो अब सोपानों से होकर गुजरा झंकृत हो तारों से सरगम बन कर्म और पुरुषार्थ की नव वीणा आज डटे है राही बनकर हम सब मंजिल की मुराद में सच यही है जीवनधारा याद उन पलों की आएगी जब मिल जाएगा सबको अपना सुनहरा किनारा बस रह जाएंगे वह पल स्मृति में बन जीवन जीने का नायाब सहारा, नायाब सहारा.....


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