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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

बेनाम

मनप्रीत सिंह संधू

ये मत सोच बदनाम करने आया हूँ मैं तो तेरा एहतराम करने आया हूँ तेरे नाम से अब मैं जाना जाऊँगा मैं खुद को बेनाम करने आया हूँ तेरी हार पर जशन मनाने वालों के सारे मनसुबे नाकाम करने आया हूँ मैं खुद को बेनाम करने आया हूँ रूतबा, पैसा, अपनी जिंदगी तक भी तेरी खातिर नीलाम करने आया हूँ मैं खुद को बेनाम करने आया हूँ मज़दूर का तो पेशा ही मज़दूरी है मत सोच के आराम करने आया हूँ मैं खुद को बेनाम करने आया हूँ तुझे तलब है के मेरे दो पल मिलें तमाम जिंदगी तेरे नाम करने आया हूँ मैं खुद को बेनाम करने आया हूँ मैं तेरे इंतज़ार का सबब जानता हूँ तेरे हिस्से सुबह शाम करने आया हूँ मैं खुद को बेनाम करने आया हूँ संधू देखना इतिहास रचेगी मोहब्बत अपनी ना सोच किस्सा तमाम करने आया हूं मैं खुद को बेनाम करने आया हूँ

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