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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

ख़बरदार! काम पर नहीं जायेंगे

महेश चंद्र द्विवेदी

पहले भी बहुत ज़िंदगी देखी थी, सुस्ती देखी थी, काहिली देखी थी; न सोचा था आयेगा आदेश कभी, जब बॉस हमें घुड़ककर समझायेंगे- ‘ख़बरदार! काम पर नहीं जायेंगे’। घर में रहेंगे, न मिलेंगे बाहरी से सोयेंगे या जागेंगे अपनी ख़ुशी से; देखेंगे सीरियल या नमकीन पिक्चर खायेंगे, पियेंगे, आराम फ़रमायेंगे- पर ‘ख़बरदार! काम पर न जायेंगे’। ख़बर दिन भर करोना की देखेंगे रेप और हिंसा न दिल दहलायेंगे; दानवीर बनने का मिलेगा मौका, भूखों को खिलायेंगे, फोटो खिचायेंगे- पर ‘ख़बरदार! काम पर न जायेंगे’। व्हाट्सऐप पर अपने वीडिओ डालेंगे ट्विटर पर छिपी विद्वत्ता निकालेंगे; फेसबुक पर नित-नित कुछ लिखकर झूठी, सच्ची दाद से मन बहलायेंगे- पर ‘ख़बरदार! काम पर न जायेंगे’। परिवार संग जमकर खेलेंगे कैरम लड़ेंगे-झगड़ेंगे औ ख़ूब बतियायेंगे; घर में दूरी की ज़रूरत ही क्या है? पत्नी के सभी गिले-शिकवे मिटायेंगे- पर ‘ख़बरदार! काम पर न जायेंगे’

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