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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

रोने से क्या होगा

क्षितिज जैन "अनघ"

अकर्मण्यता काल समाप्त हुआ मिटी अँधियारे की भी परछाई पाकर अवलंबन आकाश का प्रभात ने ओढ़ ली है तरुणाई। सुषुप्त मनों जो जाग्रत करती पहली किरण भूमि पर पड़ी नए दिन का हुआ नया आरंभ आ गयी कर्मरत होने की घड़ी। हो निश्चेष्ट मींचकर नयनों को व्यर्थ ही ऐसे सोने से क्या होगा? आँसू पोंछ डालो अपने हाथों से आखिर यूं रोने से क्या होगा? समय तुरंग होता तीव्रगामी करता नहीं किसी का इंतज़ार उस तुरंग के साथ है चलना अत: बैठ मत पथ में थक-हार। प्रत्येक मानव का अपना संघर्ष होती है कष्टों की अपनी कहानी अपनी स्थिति न दुर्लभ समझ तू उन्हें पाने वाला तू न पहला प्राणी। जब समर में धर दिये हैं पग फिर दुर्बल होने से क्या होगा? प्रलाप से दया मिले, जय नहीं आखिर यूं रोने से क्या होगा? दिशा का ज्ञान हुआ करता तभी ठोकर लगती जब कोई एकाध लड़खड़ा कर गिरने में दोष नहीं किन्तु न उठ पाने में है अपराध। जब पथ पर भरे हुए हो कंटक तो कोई और विकल्प क्या शेष है? जीवन संग्राम जब जाता है लड़ा तो सहने पड़ते अनेक क्लेश है। जो सुख-चैन फिसलते रेत जैसे तो थोड़ा और खोने से क्या होगा? जो बीत गयी सो बात गयी आखिर अब यूं रोने से क्या होगा?

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