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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

पिता

कमलेश शर्मा "कवि कमल"

पिता से ही तो महकता हर कुल है। पिता ही कल्पवृक्ष की सजीव मूल है।। ना वजूद मेरा होता, ना मैं पहचाना जाता। मेरे नाम के साथ गर, तुम्हारा नाम न आता।। बिना पिता के जीवन जैसे कोई धूल है। पिता से ही तो महकता हर कुल है ।। मन में कई आशाएं, लेकर रोज निकलता है। दिन भर मेहनत करके, पेट सभी का भरता है।। परिस्थिति कोई आये, रहता सदा प्रतिकूल है। पिता से ही तो महकता हर कुल है।। पिता माँ का सिंदूर है, किसी बहन की राखी है। पिता ही दादा दादी के, बुढ़ापे की बैसाखी है।। पिता है तो बच्चों की, मुरादें होती कुबूलहैं। पिता से ही तो महकता हर कुल है।। पिता है तो पूरे, होते सभी के सपने हैं। पिता से ही तो सारे, रिश्ते नाते अपने हैं।। पिता की बगियाँ में कभी,न मुरझाता फूल है। पिता से ही तो महकता हर कुल है।।


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