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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 87, जून(द्वितीय), 2020

कोरोना ( कोई भी रोड पर ना निकले )

हंस राज ठाकुर

इन्सान के कई चेहरे हैं, कर्म भी अलग अलग कई मानवता वादी है ,कई शैतान के वंशज । तुम रोज खेलते हो प्रकृति से, तो कदम पीछे नहीं हटते , मगर जब प्रकृति खेलती है तो दर्द बयाँ नहीं कर सकते । आज आलम है सन्नाटे का ,पूरा विश्व मौन है हर तरफ चीख पुकार ,ये कोरोना कोरोना कौन है । जिसने इसको पैदा किया,वो सब जड़ों की फ़साद है शक्ल से आदमी भी दिखे मगर वो राक्षस की औलाद है । ख़त्म कर दो इन दुष्टों को,कर दो दुनिया से अलग थलग वर्ना कभी जनता कर्फ्यू,कभी लॉक डाउन परोसे जायेंगे अलग अलग । मंदिर मस्जिद गुरद्वारे गिरिजाघर सब बंद हो गए सभी आदमी अपने घरों में नजरबन्द हो गए । खतरे में पड़ी मानव जाति ,तो खुदा याद आता है गौर से देखो उस भगवान को,हस्पताल में खड़ा नजर आता है । समय आ गया है अलग अलग रहने का ,कारोबार व् फंक्शन को बाय बाय कहने का जीवन की इस बेहतर चाल पर ,कोरोना भी क्या याद करेगा, हिंदुस्तान जिंदाबाद करेगा हिंदुस्तान जिंदाबाद करेगा , हिंदुस्तान जिंदाबाद करेगा ।


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